हिंदू धर्म किसी विशेष पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि एक साथ रहने का तरीका है : भागवत

Edited By Updated: 25 Jan, 2026 01:01 AM

hinduism is not the name of a particular method of worship

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को यहां आदिवासी समूहों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत के दौरान ‘विविधता में एकता' के महत्व पर जोर दिया। उनसे बातचीत करते हुए भागवत ने कहा कि हिंदू धर्म किसी विशेष पूजा पद्धति का नाम नहीं,...

नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को यहां आदिवासी समूहों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत के दौरान ‘विविधता में एकता' के महत्व पर जोर दिया। उनसे बातचीत करते हुए भागवत ने कहा कि हिंदू धर्म किसी विशेष पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि एक साथ रहने का एक तरीका है।

आरएसएस के एक बयान में भागवत के हवाले से कहा गया है, ‘‘भारत की पहचान विविधता में एकता पर आधारित है। पूजा पद्धति के तरीके भले ही भिन्न हों, लेकिन सभ्यता के मूल मूल्य एक समान रहते हैं। दशकों के अनुभव और चिंतन के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समाज को सामूहिक रूप से काम करना चाहिए, क्योंकि तमाम विविधताओं के बावजूद हम मूलतः एक हैं।'' उन्होंने कहा कि ‘हिंदू' शब्द बाद में सामने आया, लेकिन इसका सार ‘जल, जंगल और खेती' में निहित है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि वेद और उपनिषद दर्शन की उत्पत्ति प्रकृति के साथ इसी संबंध से हुई है, और अथर्ववेद विविधता के प्रति सम्मान के विचारों को प्रतिबिंबित करता है, जहां धरती माता सभी चीजों का पोषण करती है और सभी भाषाओं का सम्मान किया जाता है। भागवत ने ‘जनजातीय संवाद' कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समूहों के प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए विभिन्न मुद्दों को सुना, जिनमें धर्मांतरण, पेसा नियमों में कथित खामियां और सूची से नाम हटाना शामिल थे। आदिवासी मुद्दों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की समस्याएं पूरे देश की समस्याएं हैं।

भागवत ने आश्वासन दिया कि आदिवासी समुदाय की चिंताओं को प्रधानमंत्री तक पहुंचाया जाएगा और उनके समाधान खोजने के प्रयास किए जाएंगे। झारखंड में लागू किए गए पेसा नियमों में कथित खामियों के खिलाफ मुखर रहने वाली कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव ने कहा कि उन्होंने भागवत के साथ बातचीत के दौरान यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उन्हें (भागवत को) बताया कि नियमों में प्रथागत कानूनों, सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों का कोई उल्लेख नहीं है, जो इस अधिनियम का मूल आधार हैं।

इस खामी से आदिवासी समुदायों को भारी नुकसान होगा। यह आदिवासी लोगों के हित में नहीं है।'' अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने वाला पेसा अधिनियम 1996 में बना था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस महीने की शुरुआत में पेसा नियमों को अधिसूचित किया। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और चंपई सोरेन, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और अन्य आदिवासी नेताओं ने भाग लिया। झारखंड के दो दिवसीय दौरे पर आए भागवत ने शुक्रवार को आरएसएस के प्रदेश नेतृत्व से मुलाकात की थी। 

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