Edited By Pardeep,Updated: 25 Feb, 2026 11:05 PM

मध्य प्रदेश के शांत शहर सीहोर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो औपनिवेशिक दौर की वित्तीय परतों को फिर से खोल रहा है। एक स्थानीय कारोबारी परिवार का दावा है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में ब्रिटिश हुकूमत ने उनके पूर्वज से 35,000 रुपये उधार लिए...
नेशनल डेस्कः मध्य प्रदेश के शांत शहर सीहोर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो औपनिवेशिक दौर की वित्तीय परतों को फिर से खोल रहा है। एक स्थानीय कारोबारी परिवार का दावा है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में ब्रिटिश हुकूमत ने उनके पूर्वज से 35,000 रुपये उधार लिए थे और वह रकम आज तक लौटाई नहीं गई।
‘वॉर लोन’ का दस्तावेजी दावा
परिवार के अनुसार, उस समय सीहोर और भोपाल रियासत में प्रभावशाली व्यापारी रहे सेठ जुम्मालाल रूथिया ने ब्रिटिश प्रशासन को यह राशि बतौर ‘युद्ध ऋण’ दी थी। कहा जा रहा है कि यह धन प्रशासनिक जरूरतों और युद्धकालीन प्रबंधन को सुचारु करने के लिए लिया गया था। सेठ जुम्मालाल का निधन 1937 में हो गया, लेकिन परिवार का कहना है कि कर्ज चुकाने का मामला कभी निपटा नहीं और समय के साथ दब गया।
सदी बाद कानूनी नोटिस की तैयारी
अब उनके पोते विवेक रूथिया का कहना है कि परिवार को पुराने कागजात,प्रमाणपत्र, पत्राचार और वसीयत में इस ऋण से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। उनका दावा है कि वे इस “अदायगी न किए गए संप्रभु ऋण” को लेकर ब्रिटिश सरकार को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी कर रहे हैं। विवेक रूथिया का तर्क है कि 1917 के 35,000 रुपये आज के हिसाब से मामूली नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि उस समय के सोने के दाम से तुलना की जाए तो यह रकम आज करोड़ों में पहुंच सकती है।
कानूनी पेच और अंतरराष्ट्रीय सवाल
कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के दावे दुर्लभ और जटिल होते हैं, खासकर जब वे औपनिवेशिक काल के लेन-देन से जुड़े हों। सवाल यह भी है कि क्या आज का ब्रिटेन उस दौर के प्रशासनिक समझौतों के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार माना जाएगा।
कभी रियासत के प्रभावशाली जमींदार
रूथिया परिवार का नाम कभी सीहोर और भोपाल रियासत में संपन्नता और प्रभाव का प्रतीक माना जाता था। परिवार के पास विशाल जमीन-जायदाद थी। स्थानीय दावों के अनुसार, सीहोर के 20 से 30 प्रतिशत इलाके आज भी कभी उनकी जमीन रहे हिस्सों पर बसे हैं। वर्तमान में परिवार के पास सीहोर, इंदौर और भोपाल में संपत्तियां हैं और वे कृषि, होटल और रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं। हालांकि, अन्य पुराने जमींदार परिवारों की तरह वे भी विरासत से जुड़े किराया और संपत्ति विवादों में उलझे हुए हैं।
क्या मिलेगा सदी पुराना हिसाब?
यह मामला सिर्फ 35,000 रुपये का नहीं, बल्कि इतिहास, औपनिवेशिक जिम्मेदारी और अंतरराष्ट्रीय कानून की जटिलता का भी है। अब देखना होगा कि यह दावा कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचता है या फिर इतिहास के पन्नों में ही दर्ज रह जाता है।