ATM से नहीं निकले ₹10,000… 9 साल बाद कस्टमर ने बैंक से वसूले ₹3.28 लाख

Edited By Updated: 19 Mar, 2026 10:59 AM

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सूरत के एक आम नागरिक ने बैंकिंग सिस्टम की सुस्ती और गैर-जिम्मेदाराना रवैए के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर यह साबित कर दिया है कि अगर ग्राहक जागरूक हो, तो बड़े से बड़ा संस्थान भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। साल 2017 में शुरू हुआ यह मामला हाल ही में एक...

नेशनल डेस्क: सूरत के एक आम नागरिक ने बैंकिंग सिस्टम की सुस्ती और गैर-जिम्मेदाराना रवैए के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर यह साबित कर दिया है कि अगर ग्राहक जागरूक हो, तो बड़े से बड़ा संस्थान भी घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। साल 2017 में शुरू हुआ यह मामला हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले के साथ समाप्त हुआ, जिसमें उपभोक्ता अदालत ने बैंक ऑफ बड़ौदा को कड़ा सबक सिखाया है।

क्या है पूरा मामला?
कहानी शुरू होती है 18 फरवरी 2017 से, जब उधना (सूरत) के रहने वाले एक शख्स स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के एटीएम से नकदी निकालने पहुंचे। मशीन में ट्रांजैक्शन की प्रक्रिया तो हुई और खाते से 10 हजार रुपये भी कट गए, लेकिन कैश बाहर नहीं आया। आमतौर पर लोग ऐसी स्थिति में कुछ दिन इंतजार करते हैं या बैंक की एक-दो शिकायतों के बाद थककर बैठ जाते हैं, लेकिन इस उपभोक्ता ने अपने हक के लिए अंत तक लड़ने का फैसला किया।

बैंकों का टालमटोल और ग्राहक की दृढ़ता
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के अनुसार, ट्रांजैक्शन फेल होने की स्थिति में बैंक को 5 Working Days के भीतर पैसा लौटाना अनिवार्य है। पीड़ित का मुख्य खाता बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) में था, इसलिए उन्होंने 21 फरवरी को अपनी ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई। महीनों तक ईमेल और फॉलो-अप करने के बावजूद बैंक ने न तो पैसा लौटाया और न ही कोई ठोस जवाब दिया। हद तो तब हो गई जब बैंक ने सीसीटीवी फुटेज देने से भी हाथ खड़े कर दिए। ग्राहक ने हार नहीं मानी और आरटीआई (RTI) के जरिए एसबीआई से फुटेज निकलवाने की कोशिश की और अंततः दिसंबर 2017 में सूरत कंज्यूमर फोरम का दरवाजा खटखटाया।

अदालत की फटकार और भारी-भरकम हर्जाना
सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ बड़ौदा के वकील ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि एटीएम एसबीआई का था, इसलिए जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्राहक का खाता जिस बैंक में है, यह साबित करना उसी की जिम्मेदारी है कि पैसे निकले थे या नहीं।

कोर्ट ने RBI के 2019 के उस सर्कुलर का हवाला दिया जिसमें प्रावधान है कि ट्रांजैक्शन फेल होने के 5 दिन बाद से बैंक को प्रतिदिन 100 रुपये का हर्जाना ग्राहक को देना होगा।

अंतिम फैसला: 10 हजार के बदले 3 लाख से ज्यादा
26 फरवरी 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में कोर्ट ने बैंक ऑफ बड़ौदा को आदेश दिया कि वह 24 फरवरी 2017 से लेकर भुगतान की तारीख तक 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना भरे। लगभग 3288 दिनों की इस देरी के चलते मुआवजे की यह राशि 3 लाख 28 हजार 800 रुपये तक जा पहुंची है। इसके अलावा, बैंक को मूल 10 हजार रुपये की राशि 9 प्रतिशत ब्याज के साथ भी लौटानी होगी। अगर बैंक भुगतान में 30 दिन की और देरी करता है, तो यह राशि बढ़कर 3 लाख 31 हजार 500 रुपये से भी अधिक हो जाएगी।

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