Edited By Parveen Kumar,Updated: 27 Oct, 2025 09:08 PM

भारत ने अक्टूबर में अमेरिका से कच्चे तेल का आयात 2022 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। यह कदम रूस से सप्लाई में विविधता लाने और ट्रंप प्रशासन के साथ बढ़ते व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में उठाया गया माना जा रहा है।
नेशनल डेस्क: भारत ने अक्टूबर में अमेरिका से कच्चे तेल का आयात 2022 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। यह कदम रूस से सप्लाई में विविधता लाने और ट्रंप प्रशासन के साथ बढ़ते व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में उठाया गया माना जा रहा है।
ऊर्जा बाजार विश्लेषक कंपनी केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, 27 अक्टूबर तक अमेरिका से भारत का कच्चा तेल आयात 5.4 लाख बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया- जो दो साल में सबसे ज्यादा है। अमेरिकी निर्यात आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर का महीना करीब 5.75 लाख बैरल प्रति दिन के साथ खत्म होने की संभावना है, जबकि नवंबर में यह 4 से 4.5 लाख बैरल प्रति दिन के बीच रह सकता है। यह पिछले साल के औसत (3 लाख बैरल प्रति दिन) की तुलना में एक बड़ी छलांग है।
रूस अब भी सबसे बड़ा सप्लायर
रूस फिलहाल भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, जो कुल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। इसके बाद इराक और फिर सऊदी अरब का स्थान आता है। केप्लर के सीनियर एनालिस्ट सुमित रिटोलिया के मुताबिक, अमेरिका से आयात में यह तेजी मजबूत आर्बिट्रेज विंडो, ब्रेंट-डब्ल्यूटीआई के व्यापक अंतर और चीन की कमजोर मांग जैसे कारकों से प्रेरित है।
भारतीय रिफाइनर अब मिडलैंड डब्ल्यूटीआई और मार्स जैसे अमेरिकी ग्रेड्स की खरीद बढ़ा रहे हैं ताकि सप्लाई में विविधता लाई जा सके और वाशिंगटन के साथ सहयोग का संकेत भी दिया जा सके।
ट्रंप प्रशासन के साथ तनाव कम करने की कोशिश
अमेरिका से बढ़ता तेल आयात भारत के लिए कूटनीतिक रूप से भी अहम संकेत माना जा रहा है। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने भारत से आने वाले सामानों पर 50% तक का भारी शुल्क लगाया था। ऐसे में अमेरिका से अधिक तेल खरीदना व्यापारिक तनाव को संतुलित करने और वाशिंगटन को सकारात्मक संकेत देने की एक रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
क्या यह वृद्धि टिकाऊ है?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उछाल संरचनात्मक नहीं बल्कि अस्थायी है। रिटोलिया के अनुसार, “भारत का रिफाइनिंग सिस्टम लचीला है और वह बाजार के अल्पकालिक अवसरों को तुरंत भुना सकता है, लेकिन अमेरिका से आयात बढ़ाने में लंबी यात्रा अवधि, ऊंची शिपिंग लागत और डब्ल्यूटीआई की हल्की गुणवत्ता जैसी चुनौतियां हैं।”