LPG Supply Crisis: लॉकडाउन जैसा बेबस नज़ारा, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात में हालात बेकाबू, रेलवे स्टेशनों पर मजदूरों की भीड़

Edited By Updated: 31 Mar, 2026 09:11 AM

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मध्य-पूर्व के युद्ध की लपटों ने भारत के रसोईघरों और औद्योगिक पहियों को अपनी चपेट में ले लिया है। राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में एलपीजी (LPG) की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। हालात इस कदर...

नेशनल डेस्क: मध्य-पूर्व के युद्ध की लपटों ने भारत के रसोईघरों और औद्योगिक पहियों को अपनी चपेट में ले लिया है। राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में एलपीजी (LPG) की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि अब रेलवे स्टेशनों पर कोरोना काल के लॉकडाउन जैसे मंज़र दिखाई देने लगे हैं। 

राजस्थान में औद्योगिक पहिए थमे, हजारों हुए बेरोजगार
राजस्थान के औद्योगिक क्षेत्रों में हाहाकार मचा हुआ है। व्यावसायिक गैस की भारी किल्लत के चलते अजमेर, जयपुर और रींगस जैसे इलाकों में स्थित कपड़ा, सेरामिक, मार्बल और केमिकल फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर हैं। रींगस की प्रसिद्ध बोरोसिल फैक्ट्री सहित कई अन्य इकाइयों में काम ठप हो जाने से हजारों मजदूर रातों-रात बेरोजगार हो गए हैं। जयपुर के सीतापुरा इंडस्ट्रियल एरिया में मजदूरों को हिसाब कर घर जाने को कह दिया गया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि जयपुर और अजमेर के रेलवे स्टेशनों पर मजदूरों की वैसी ही भीड़ उमड़ रही है, जैसी कोरोना काल के लॉकडाउन में देखी गई थी।

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मुंबई में कालाबाजारी का बोलबाला और 'मजबूरी का पलायन'
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में रसोई गैस के लिए हाहाकार मचा है। नवी मुंबई में लोग सुबह से ही खाली सिलेंडर लेकर लंबी कतारों में खड़े हो रहे हैं। इस संकट का फायदा उठाकर बिचौलिए सक्रिय हो गए हैं। ₹900 का सिलेंडर अब ब्लैक मार्केट में ₹2500 से ₹3000 के बीच बिक रहा है। लोकमान्य तिलक टर्मिनस (LTT) पर घर लौटने वाले मजदूरों का कहना है कि न तो गैस मिल रही है और न ही बाहर का खाना वहन करने की हिम्मत है। मजदूरों का मानना है कि शहर में भूखे मरने से बेहतर है कि गाँव लौट जाएं, जहाँ कम से कम जलावन और लकड़ी के सहारे चूल्हा तो जल सकेगा।

सूरत में भी संकट गहराया, बर्तनों के साथ गांव लौट रहे मजदूर
गुजरात का सूरत शहर भी इस संकट से अछूता नहीं है। घरेलू एलपीजी की कमी और बढ़ती कीमतों ने प्रवासी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। सूरत रेलवे स्टेशन पर अपनी गृहस्थी का सामान-बर्तन, बाल्टी और चूल्हा-समेट कर ट्रेनों में चढ़ते मजदूरों का मंजर डरावना है। उनका साफ़ कहना है कि जब खाना बनाना ही मुमकिन नहीं है, तो काम करने का क्या फायदा।

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सरकारी हेल्पलाइन और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
हालात को संभालने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने हेल्पलाइन नंबर (जैसे 14435) जारी किए हैं, लेकिन उद्योग जगत का आरोप है कि ये नंबर बेअसर साबित हो रहे हैं। बगरू इंडस्ट्री एसोसिएशन के अनुसार, हेल्पलाइन पर बैठे कर्मचारी नए सरकारी आदेशों से अनभिज्ञ हैं और उद्योगों को राहत देने की कोई स्पष्ट योजना उनके पास नहीं है। हालाँकि, कुछ राहत की खबर यह है कि 'BW Elm' और 'BW Tyr' नामक दो बड़े टैंकर करीब 94,000 टन एलपीजी लेकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर भारत की ओर बढ़ रहे हैं।

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सरकार के कड़े कदम और भविष्य की आशंका
ईंधन संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने नियमों में ढील देते हुए पेट्रोल पंपों पर केरोसिन (मिट्टी का तेल) की बिक्री को फिर से हरी झंडी दे दी है। दिल्ली जैसे शहरों में भी गैस वितरण के लिए नए कोटे तय किए जा रहे हैं। जानकारों की मानें तो यदि खाड़ी देशों में युद्ध जल्द शांत नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में ईंधन की किल्लत और बढ़ सकती है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित होगी। जनता की मांग है कि सरकार युद्ध स्तर पर वैकल्पिक इंतजाम करे ताकि किसी के घर का चूल्हा न बुझे।

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