मुंबई यूनिवर्सिटी ने 600 से ज्यादा छात्रों का PhD रजिस्ट्रेशन किया रद्द, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 05:03 PM

mumbai university phd cancelled

फरवरी 2026 में University of Mumbai ने एक सख्त प्रशासनिक फैसला लेते हुए 644 पीएचडी शोधार्थियों का नामांकन रद्द कर दिया।

नेशनल डेस्क: फरवरी 2026 में University of Mumbai ने एक सख्त प्रशासनिक फैसला लेते हुए 644 पीएचडी शोधार्थियों का नामांकन रद्द कर दिया। विश्वविद्यालय प्रशासन के मुताबिक ये वे छात्र थे जिन्होंने तय समय सीमा के भीतर अपनी डॉक्टरेट पूरी नहीं की थी। कई मामलों में शोधार्थी 10 वर्ष से अधिक समय तक थीसिस जमा नहीं कर पाए थे।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया। करीब छह महीने तक चली समीक्षा प्रक्रिया के बाद यह कदम उठाया गया, जिसमें University Grants Commission (UGC) के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया।

क्या रहा पूरा घटनाक्रम?

सितंबर 2025 से विश्वविद्यालय ने ऐसे शोधार्थियों की पहचान शुरू की जो वर्षों से पीएचडी पूरी नहीं कर पाए थे। प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच की गई। जिन मामलों में अधिकतम समय सीमा पार हो चुकी थी, उनका नामांकन फरवरी 2026 में औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया।

उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में पीएचडी पंजीकरण रद्द होना असाधारण माना जा रहा है। इसे शोध कार्यक्रमों में जवाबदेही और अनुशासन लागू करने की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है।

10 साल से अधिक की देरी, सीटें हो रही थीं ब्लॉक

विश्वविद्यालय के अनुसार, कई शोधार्थी एक दशक से अधिक समय से पंजीकृत थे लेकिन शोध कार्य पूरा नहीं कर सके। इससे नई पीढ़ी के रिसर्च स्कॉलर्स को प्रवेश में कठिनाई हो रही थी।

गाइड्स की सीटें लंबे समय तक खाली नहीं हो पा रही थीं, जिससे विभागों की रिसर्च क्षमता प्रभावित हो रही थी। प्रशासन का मानना है कि इस कार्रवाई से नए आवेदकों को अवसर मिलेगा और डॉक्टरेट कार्यक्रमों की गति तेज होगी।

 पीएचडी की समय सीमा क्या है?

यूजीसी के नियमों के अनुसार:

  • पीएचडी की न्यूनतम अवधि: 3 वर्ष
  • अधिकतम अवधि: 6 वर्ष (कोर्सवर्क सहित)
  • विशेष परिस्थितियों में पुन: पंजीकरण के माध्यम से 2 वर्ष का अतिरिक्त समय
  • कुल अधिकतम सीमा सामान्यतः 8 वर्ष
  • महिला शोधार्थियों और 40% से अधिक दिव्यांगता वाले छात्रों को अतिरिक्त 2 वर्ष की छूट दी जा सकती है, जिससे कुल अवधि 10 वर्ष तक पहुंच सकती है।
  • इसके अलावा, महिला शोधार्थियों को मातृत्व या बाल देखभाल के लिए 240 दिनों तक का अवकाश भी मिल सकता है। हालांकि, 10 वर्ष से अधिक समय किसी भी स्थिति में स्वीकृत नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम उच्च शिक्षा में समयबद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि जिन छात्रों का नामांकन रद्द हुआ है, उनके लिए यह फैसला बड़ा झटका साबित हो सकता है। फिलहाल, विश्वविद्यालय का जोर शोध प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने पर है।

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