NH-29 चौड़ीकरण के लिए स्थानीय निवासी ने दी अपनी जमीन, 7 साल बाद मिला इतने करोड़ का मुआवजा

Edited By Updated: 24 Jan, 2026 12:28 PM

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एक स्थानीय निवासी के 7 साल पुराने संघर्ष को आखिरकार गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने नजीरिया हल कर दिया है। कोहिमा के थजाओ सेखोसे ने लंबे समय तक नेशनल हाईवे-29 के चौड़ीकरण के दौरान अपनी संपत्ति को हुए नुकसान का मुआवजा पाने के लिए संघर्ष किया, और अब...

नेशनल डेस्क:  एक स्थानीय निवासी के 7 साल पुराने संघर्ष को आखिरकार गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने नजीरिया हल कर दिया है। कोहिमा के थजाओ सेखोसे ने लंबे समय तक नेशनल हाईवे-29 के चौड़ीकरण के दौरान अपनी संपत्ति को हुए नुकसान का मुआवजा पाने के लिए संघर्ष किया, और अब न्यायालय ने उन्हें राहत दिलाई है।

हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL) को निर्देश दिया है कि वह तीन महीने के भीतर याचिकाकर्ता को लगभग 1.30 करोड़ रुपए का मुआवजा चुकाए। इसमें संपत्ति का नुकसान 1.16 करोड़ और काटे गए पेड़ों का मूल्य 13.93 लाख रुपए शामिल है।

थजाओ सेखोसे ने अदालत में आरोप लगाया था कि NH-29 को फोर लेन बनाने के दौरान भारी खुदाई और मिट्टी कटाई के कारण उनके इलाके में भूस्खलन शुरू हो गया। परिणामस्वरूप उनकी तीन मंजिला आरसीसी इमारत, सूअर पालन केंद्र और सीढ़ीदार खेत पूरी तरह अनुपयोगी हो गए। इसके अलावा उनके लगभग 80 पेड़ काट दिए गए, निजी रास्ता बंद कर दिया गया और निर्माण कार्य के दौरान कचरा उनके क्षेत्र में डाला गया।

जस्टिस मृदुल कुमार कलिता ने अपने आदेश में NHIDCL की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संपत्ति का नुकसान सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि नागरिकों के आजीविका और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) और संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 300A) का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि समान परिस्थिति में अन्य प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया जा चुका है, इसलिए याचिकाकर्ता को मुआवजा न देना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के खिलाफ होगा।

NHIDCL ने पहले तर्क दिया था कि नुकसान के लिए जिम्मेदार ठेकेदार कंपनी, गायत्री प्रोजेक्ट्स लिमिटेड है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य कार्यकारी प्राधिकरण होने के नाते जिम्मेदारी NHIDCL की ही है। भुगतान के बाद वह ठेकेदार से अपनी राशि वसूल कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता 2018 से मुआवजे की मांग कर रहे थे, और इतने लंबे समय तक इंतजार के बाद अब उन्हें सिविल कोर्ट भेजना अनुचित होगा। इसलिए हाईकोर्ट ने सीधे मुआवजे का आदेश जारी किया। यह फैसला एक अहम मिसाल है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में नागरिकों की संपत्ति और अधिकारों की रक्षा न्यायिक दृष्टि से कितनी गंभीरता से की जाती है।

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