2050 तक 60 साल के वृद्धों की आबादी में 20 फीसदी बढ़ोतरी हाने का अनुमान, सामने आई ये चौंका देने वाली रिपोर्ट

Edited By Anil dev, Updated: 17 Mar, 2022 11:11 AM

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आने वाले करीब 28 सालों में देश में वृद्धों के स्वास्थ्य और सुविधाएं मुहैया करवाना केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है। चूंकि यूएन वर्ल्ड पापुलेशन एजिंग रिपोर्ट के अनुसार भारत की वृद्ध आबादी जिसमें 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग शामिल हैं,

नेशनल डेस्क: आने वाले करीब 28 सालों में देश में वृद्धों के स्वास्थ्य और सुविधाएं मुहैया करवाना केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है। चूंकि यूएन वर्ल्ड पापुलेशन एजिंग रिपोर्ट के अनुसार भारत की वृद्ध आबादी जिसमें 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग शामिल हैं, उनकी संख्या 2050 तक वर्तमान के 8 फीसदी के मुकाबले बढ़कर लगभग 20 फीसदी हो जाएगी। जैसे-जैसे भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है और परिवार छोटी इकाइयों में बंट रहे हैं, आमतौर पर शहरी एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में वृद्धाश्रमों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है।

इसके साथ ही वृद्ध लोगों की देखभाल का प्रबंधन अब पेशेवरों या स्वैच्छिक संगठनों द्वारा संभाला जाने लगा है जहां उन्हें सरकार और स्थानीय परोपकारी व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त होता है। जानकारों का मानना है कि सरकारों को अभी से वृद्धाश्रमों के प्रति एक औपचारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए एक व्यापक नीति का निर्धारण करना चाहिए। वृद्धाश्रमों के सहयोग एवं समर्थन करने के लिये एक सुदृढ़ सार्वजनिक नीति का होना महत्त्वपूर्ण है। इन वृद्धाश्रमों को उनकी सुविधाओं, भवनों और सामाजिक वातावरण को वृद्ध व्यक्तियों के अनुकूल बनाने के लिये नीतिगत हस्तक्षेपों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। 2050 तक देश का हर पांचवां आदमी 'बुजुर्ग’ होगा। 

आबादी में वृद्धि के क्या हैं कारण ?
वैश्विक स्तर पर वर्ष 2050 तक वृद्ध लोगों की संख्या में 326 फीसदी की वृद्धि होगी, जबकि इनमें 80 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या में 700 फीसदी की वृद्धि होगी। वृद्ध आबादी में लगातार वृद्धि का एक प्रमुख कारण जीवन प्रत्याशा में अभूतपूर्व वृद्धि है जो आर्थिक विकास के एक सतत दौर और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच के कारण हुई है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती वृद्ध व्यक्तियों को गुणवत्तापूर्ण, सस्ती एवं सुलभ स्वास्थ्य एवं देखभाल सेवाएं प्रदान करना है। जानकारों का कहना है कि यह आवश्यक है कि हमारी नीतिगत रूपरेखा और सामाजिक प्रतिक्रियाएं इस वास्तविकता का सामना कर सकने के लिये पर्याप्त रूप से तैयार हों। 

वृद्धाश्रम में क्या हैं फायदे और नुकसान
कुछ वृद्ध लोग वृद्धाश्रम में ही स्वतंत्रता और मैत्रीपूर्ण माहौल के लिये अधिक सहज महसूस करते हैं जहां अपने जैसे अन्य लोगों के साथ रहते हुए एक दूसरे से बातचीत करते हुए वे सुखद समय व्यतीत करते हैं। कई बार तो वे परिवार के सदस्यों से किसी भी तरह की असुरक्षा महसूस करने लगते हैं और वृद्धाश्रम ही में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। हालांकि ये वृद्धाश्रम हमेशा ही अच्छी सुविधाएं प्रदान नहीं करते हैं। प्रबंधन द्वारा सभी वृद्ध व्यक्तियों की एकसमान अच्छी देखभाल नहीं की जाती और कुछ वृद्धाश्रम कई प्रकार के प्रतिबंध भी लागू करते हैं।

वृद्धाश्रमों में बढ़ते दुर्व्यवहार के मामले  
निम्न गुणवत्तापूर्ण भोजन और उनकी अपर्याप्त मात्रा की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। शयनकक्षों और शौचालयों की साफ-सफाई उचित प्रकार से नहीं की जाती। कुछ वृद्धाश्रमों का प्रबंधन वृद्ध व्यक्तियों के बच्चों द्वारा किये गए भुगतान या दान का ठीक प्रकार से उपयोग नहीं करता जिससे उनके असहाय माता-पिता परेशानियों के शिकार होते हैं। वृद्धाश्रमों में ऐसे दुर्व्यवहार और दुरुपयोग के मामले प्रायः चर्चा में आते रहते हैं, लेकिन स्थिति में सुधार के लिये शायद ही कभी कोई कार्रवाई की जाती है। इससे वृद्ध व्यक्तियों के शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट का उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

ज्यादातर होते हैं दृष्टि दोष का शिकार
एक मीडिया रिपोर्ट में हैदराबाद स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन द्वारा ‘हैदराबाद ओकुलर मोरबिडिटी इन एल्डरली स्टडी ’शीर्षक वाले हालिया अध्ययन का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया है कि  इन वृद्धाश्रमों के लगभग 30 फीसदी निवासी  किसी-न-किसी तरह के दृष्टि दोष के शिकार थे। अध्ययन में 40 गृहाश्रमों के 1,500 से अधिक प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इस अध्ययन में दृष्टि दोष के कुछ अनदेखे प्रभाव भी दर्ज किये गए। दृष्टि दोष के शिकार वृद्धों में से कई अवसाद से ग्रस्त थे। वास्तव में दृष्टि और श्रवण दोष दोनों के शिकार वृद्धों में अवसाद की दर उन लोगों की तुलना में पांच गुना अधिक थी जो इन दोषों से मुक्त थे।

जरावस्था स्वास्थ्य सुविधाओं का आभाव
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) चंडीगढ़ के एक अध्ययन के अनुसार अधिकांश मेडिकल स्कूलों में जरा-चिकित्सा विषय में विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। देश में जो भी जरा-चिकित्सा देखभाल सुविधा उपलब्ध है, वह शहरी क्षेत्रों के तृतीयक अस्पतालों तक ही सीमित है और यह अत्यधिक महंगा है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि जरावस्था (बुढ़ापा) स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं का अंग बनाया जाना चाहिए। केंद्र को एक व्यापक निवारक पैकेज लेकर आना चाहिये जो पोषण, व्यायाम और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देने पर ध्यान देने के साथ सामान्य जरावस्था समस्याओं के बारे में जागरूकता प्रदान करे। 

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