Edited By Anu Malhotra,Updated: 18 Oct, 2026 07:56 AM

नेपाल सरकार की एक 55 वर्षीय अधिकारी, जो पार्किंसंस बीमारी के कारण शरीर में कंपन और चलने-फिरने में कठिनाई का सामना कर रही थीं और पिछले छह महीनों से लंबी छुट्टी पर थीं, उनकी डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में 'डीप ब्रेन स्टिमुलेशन' (DBS) सर्जरी की...
नई दिल्ली : नेपाल सरकार की एक 55 वर्षीय अधिकारी, जो पार्किंसंस बीमारी के कारण शरीर में कंपन और चलने-फिरने में कठिनाई का सामना कर रही थीं और पिछले छह महीनों से लंबी छुट्टी पर थीं, उनकी डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में 'डीप ब्रेन स्टिमुलेशन' (DBS) सर्जरी की गई है। अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग ने रेडियोलॉजी और एनेस्थीसिया विभागों के डॉक्टरों की मदद से पहली बार यह प्रक्रिया पूरी की।
यह महिला नेपाल सरकार में अवर सचिव (अंडर सेक्रेटरी) हैं। वह पहले एक निजी अस्पताल में इलाज करा रही थीं, लेकिन वहां इस प्रक्रिया का खर्च बहुत अधिक था। डॉक्टरों के अनुसार, निजी केंद्रों पर इस इलाज में 25 से 30 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है, जबकि RML अस्पताल में इसका खर्च न के बराबर रहा।
न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर शरद पांडे ने एक मीडिया संस्थान को बताया कि पिछले हफ्ते हुई यह प्रक्रिया सुबह करीब 9 बजे शुरू हुई और शाम 5:30 बजे के आसपास पूरी हुई। मरीज को 5 से 6 दिनों तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा। इस दौरान डॉक्टर मरीज के लक्षणों के आधार पर, शरीर में लगाई गई डिवाइस को प्रोग्राम करेंगे और उसकी सेटिंग्स को एडजस्ट करेंगे। उन्होंने बताया, "डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) आमतौर पर उन मरीजों के लिए किया जाता है, जिनके पार्किंसंस के लक्षण दवाओं से ठीक से नियंत्रित नहीं हो पाते हैं।"
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन में, मस्तिष्क के कुछ खास हिस्सों में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। ये इलेक्ट्रोड इलेक्ट्रिकल इम्पल्स (विद्युत संकेत) भेजते हैं, जिससे शरीर की असामान्य गतिविधियों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। छाती में एक बैटरी से चलने वाली डिवाइस लगाई जाती है, जो इन इलेक्ट्रोड्स से जुड़ी होती है। डॉक्टर बाहर से ही स्टिमुलेशन सेटिंग्स को एडजस्ट कर सकते हैं ताकि लक्षणों को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सके।
मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड कहां लगाए जाएंगे, यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। पार्किंसंस बीमारी में, इलेक्ट्रोड को 'सबथैलेमिक न्यूक्लियस' (STN) या 'ग्लोबस पैलिडस' जैसे हिस्सों में लगाया जा सकता है। इस प्रक्रिया के लिए विस्तृत MRI और CT स्कैन, विशेष प्लानिंग सॉफ्टवेयर और मस्तिष्क के गहरे हिस्सों को बहुत सटीकता से निशाना बनाने की आवश्यकता होती है।
डॉ. पांडे ने बताया, "अगर एक मिलीमीटर का भी अंतर आ जाए, तो परिणाम पर बड़ा असर पड़ सकता है।" उन्होंने समझाया कि सर्जरी से पहले, उनकी टीम मस्तिष्क के उस हिस्से को मैप करती है जहाँ इलेक्ट्रोड लगाना है, और फिर इलेक्ट्रोड लगाने के लिए सही जगह (कोऑर्डिनेट्स), कोण (एंगल्स) और रास्ते (ट्रैजेक्टरी) की गणना करती है। डॉक्टरों का मानना है कि एक महीने के भीतर शुरुआती सुधार दिखने लगेंगे, और अगले तीन से छह महीनों में और अधिक स्पष्ट लाभ देखने को मिलेंगे। डिवाइस की प्रोग्रामिंग और मरीज पर इसके असर का आकलन करने के लिए उसे दोबारा अस्पताल आना होगा (फॉलो-अप)। अगर मरीज के लक्षणों में सुधार होता है, तो डॉक्टरों की देखरेख में धीरे-धीरे उसकी दवाओं में भी बदलाव किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया के लिए कई तरह के विशेषज्ञों की टीम, विशेष बुनियादी ढांचे और काफी खर्च की जरूरत होती है, जिस वजह से सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती। डॉक्टरों का कहना है कि अगर सही मरीजों की पहचान कर भी ली जाए, तो भी जरूरी सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें यह इलाज नहीं मिल पाता। सर्जरी की योजना बनाने के लिए जरूरी इमेजिंग के वास्ते RML की टीम ने रेडियोलॉजी विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम किया, जबकि एनेस्थीसिया विशेषज्ञों ने इस प्रक्रिया में सहयोग दिया।