Edited By Anu Malhotra,Updated: 09 Jan, 2026 03:01 PM

गर्भावस्था के दौरान मां द्वारा ली गई दवाओं का असर सिर्फ मां तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव नवजात की सेहत पर भी पड़ सकता है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में सामने आया है कि प्रेग्नेंसी के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करने से बच्चों में...
नेशनल डेस्क: गर्भावस्था के दौरान मां द्वारा ली गई दवाओं का असर सिर्फ मां तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव नवजात की सेहत पर भी पड़ सकता है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में सामने आया है कि प्रेग्नेंसी के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करने से बच्चों में एक गंभीर बैक्टीरियल बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।
यह बीमारी Group-B स्ट्रेप्टोकोकस (GBS) कहलाती है। आमतौर पर यह बैक्टीरिया आंतों या जननांगों में बिना नुकसान के मौजूद रहता है, लेकिन नवजात शिशुओं, बुजुर्गों और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों में यह जानलेवा संक्रमण का रूप ले सकता है। इससे सेप्सिस, मेनिन्जाइटिस और निमोनिया जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट, बेल्जियम की यूनिवर्सिटी ऑफ एंटवर्प सहित अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक लेने से जन्म के चार हफ्तों के भीतर नवजात में GBS संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। खासतौर पर गर्भावस्था की तीसरी तिमाही के शुरुआती दौर में लिया गया इलाज सबसे ज्यादा जोखिम भरा पाया गया।
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि प्रसव से चार हफ्ते पहले एंटीबायोटिक का संपर्क नवजात में GBS संक्रमण की आशंका को बढ़ा सकता है, खासकर उन शिशुओं में जिन्हें जोखिम-आधारित इंट्रापार्टम प्रोफिलैक्सिस का लाभ नहीं मिला।
इस अध्ययन के लिए 2006 से 2016 के बीच स्वीडन में हुए सभी सिंगलटन जीवित जन्मों का विश्लेषण किया गया। कुल 10,95,644 नवजातों के डेटा में पाया गया कि करीब 24.5 प्रतिशत बच्चों की माताओं ने गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक दवाएं ली थीं।

रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन नवजातों की माताएं एंटीबायोटिक के संपर्क में रहीं, उनमें GBS संक्रमण की दर उन बच्चों की तुलना में ज्यादा थी, जो इस संपर्क में नहीं आए। संक्रमित बच्चों की दर 1,000 जन्मों पर 0.86 रही, जबकि बिना संपर्क वाले बच्चों में यह आंकड़ा 0.66 था। यह अंतर खासतौर पर उन नवजातों में अधिक दिखा, जिनमें पहले से GBS से जुड़े कोई जोखिम कारक मौजूद नहीं थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह पहला अध्ययन है जिसने गर्भावस्था में एंटीबायोटिक उपयोग और नवजात में GBS संक्रमण के बीच सीधे संबंध की जांच की है। यह नतीजे पहले के नॉर्डिक अध्ययनों से मेल खाते हैं, जिनमें गर्भ में एंटीबायोटिक के संपर्क के बाद 1 से 5 साल की उम्र के बच्चों में संक्रमण का खतरा 16 से 34 प्रतिशत तक बढ़ने की बात कही गई थी।
एक अहम निष्कर्ष यह भी रहा कि प्रसव के बेहद करीब दी गई GBS-रोधी एंटीबायोटिक दवाएं नवजात को इस संक्रमण से बचाने में प्रभावी साबित नहीं हुईं। इसके अलावा, किसी भी प्रकार की एंटीबायोटिक का प्रभाव नवजात में GBS बीमारी के जोखिम पर इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भावस्था के दौरान पहले से कोई क्लिनिकल जोखिम कारक मौजूद थे या नहीं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन मामलों में GBS से जुड़े जोखिम कारक नहीं होते, वहां एंटीबायोटिक का सीमित उपयोग नवजात के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। टीम ने आगे और शोध की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे नवजातों की निगरानी और सतर्कता बढ़ाई जानी चाहिए, जो मौजूदा GBS रोकथाम दिशानिर्देशों के दायरे में नहीं आते, खासकर वे शिशु जिनकी माताओं ने गर्भावस्था की शुरुआती तीसरी तिमाही में एंटीबायोटिक ली हो।