Edited By Radhika,Updated: 11 Mar, 2026 12:14 PM

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते सैन्य तनाव का असर अब सीधे आम आदमी की जेब और स्वास्थ्य बजट पर पड़ता दिख रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की किल्लत के बीच अब भारत में दवाओं की कीमतों में वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। इससे पहले महज 14...
Medicine Price Hike: ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते सैन्य तनाव का असर अब सीधे आम आदमी की जेब और स्वास्थ्य बजट पर पड़ता दिख रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की किल्लत के बीच अब भारत में दवाओं की कीमतों में वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। इससे पहले महज 14 दिनों के भीतर दवा बनाने में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल (API) की लागत में 30 % तक का भारी उछाल आया है, जिसने भारतीय फार्मा सेक्टर को संकट में डाल दिया है।
चीन से आपूर्ति में बाधा और शिपिंग का बढ़ता बोझ
भारतीय दवा उद्योग अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीन से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर है। वर्तमान में ईरान युद्ध के चलते समुद्री रास्तों पर जहाजों की कमी हो गई है, जिससे सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। माल ढुलाई की दरें न केवल दोगुनी हो गई हैं, बल्कि अब शिपमेंट पर 4,000 से 8,000 डॉलर तक का अतिरिक्त सरचार्ज भी वसूला जा रहा है।

पेट्रोकेमिकल्स और सॉल्वेंट्स के दाम भी आसमान पर पहुंचे
विशेषज्ञों के अनुसार, दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स पेट्रोकेमिकल्स से तैयार होते हैं। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिससे इन सॉल्वेंट्स की कीमतों में एक सप्ताह के भीतर ही भारी बढ़त देखी गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो:
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
फार्मा इंडस्ट्री के दिग्गजों का कहना है कि भारत में दवा की कीमतें पहले से ही सख्त सरकारी नियंत्रण में हैं। फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स और अन्य संगठनों ने नेशनल फार्मा प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) से मांग की है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए दवाओं के दाम बढ़ाने की विशेष अनुमति दी जाए।

कंपनियां आमतौर पर 'जस्ट-इन-टाइम' इन्वेंट्री मॉडल पर काम करती हैं, जिसका अर्थ है कि उनके पास कच्चे माल का बहुत अधिक स्टॉक नहीं होता। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध और 10-15 दिन खिंचता है, तो न केवल कीमतें बढ़ेंगी, बल्कि बाजार में जरूरी दवाओं की उपलब्धता का संकट भी खड़ा हो सकता है।