Edited By Anu Malhotra,Updated: 14 Jan, 2026 04:12 PM

भारतीय रेलवे में परोसे जाने वाले नॉनवेज भोजन को लेकर लंबे समय से दबा हुआ विवाद अब राष्ट्रीय मंच पर आ गया है। “झटका बनाम हलाल” बहस ने कानूनी और संवैधानिक रूप ले लिया है। सिख संगठनों की ओर से दायर शिकायत के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने...
नेशनल डेस्क: भारतीय रेलवे में परोसे जाने वाले नॉनवेज भोजन को लेकर लंबे समय से दबा हुआ विवाद अब राष्ट्रीय मंच पर आ गया है। “झटका बनाम हलाल” बहस ने कानूनी और संवैधानिक रूप ले लिया है। सिख संगठनों की ओर से दायर शिकायत के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने रेलवे बोर्ड, खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) और संस्कृति मंत्रालय के सचिव को औपचारिक नोटिस जारी किया है। आयोग का कहना है कि यदि रेलवे यात्रियों को केवल हलाल मांस परोस रहा है और इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं दी जा रही, तो यह उपभोक्ताओं के चयन के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता—दोनों पर चोट हो सकती है।
सिख रहत मर्यादा का हवाला, पारदर्शिता पर सवाल
NHRC ने अपने नोटिस में स्पष्ट किया है कि सिख धर्म की आचार संहिता, जिसे सिख रहत मर्यादा कहा जाता है, सिखों को हलाल मांस के सेवन की अनुमति नहीं देती। ऐसे में यदि सिख यात्रियों को यह नहीं बताया जा रहा कि परोसा गया मांस किस विधि से तैयार किया गया है, तो यह उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
NHRC के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने इस मुद्दे पर कहा कि जानकारी छिपाना किसी भी उपभोक्ता के साथ अन्याय है। उनके अनुसार, यात्रियों को यह जानने का पूरा हक है कि वे जो भोजन कर रहे हैं, वह उनकी आस्था और व्यक्तिगत विश्वासों के अनुरूप है या नहीं।
संस्कृति मंत्रालय और FSSAI को भी निर्देश
आयोग ने संस्कृति मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह देशभर के खाने-पीने से जुड़े संस्थानों और दुकानों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि यह साफ तौर पर दर्शाया जाए कि मांस हलाल है या झटका। NHRC का मानना है कि ऐसी पारदर्शिता का अभाव न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों के भी खिलाफ है।
वहीं FSSAI को भेजे गए नोटिस में आयोग ने कहा है कि नॉनवेज खाद्य पदार्थों के प्रमाणन में यह अनिवार्य रूप से लिखा जाना चाहिए कि मांस किस पद्धति से तैयार किया गया है। इससे उपभोक्ताओं को अपनी धार्मिक और निजी मान्यताओं के अनुसार विकल्प चुनने में आसानी होगी।
रोजगार से जुड़ा संवेदनशील पहलू भी उठा
प्रियंक कानूनगो ने इस विवाद के सामाजिक और आर्थिक पक्ष पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि दारुल उलूम देवबंद की व्याख्या के अनुसार हलाल मांस वही माना जाता है, जिसमें पशु बलि केवल मुस्लिम व्यक्ति द्वारा दी गई हो। इसका असर यह होता है कि हिंदू दलित समुदाय, जो पारंपरिक रूप से पशु बलि और मांस व्यापार से जुड़े रहे हैं, रोजगार के अवसरों से बाहर हो जाते हैं। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ भोजन की पसंद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समान अवसर और आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी सामने रखा
अपने बयान में कानूनगो ने अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां तक कि मुस्लिम देशों की एयरलाइंस भी यात्रियों को विकल्प देती हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि एतिहाद एयरलाइंस जैसी कंपनियां यात्रियों को हलाल और हिंदू झटका भोजन में से चुनने की सुविधा देती हैं।