Edited By Anu Malhotra,Updated: 01 Jul, 2026 02:29 PM
70 साल पहले पृथ्वी का सिर्फ एक ही प्राकृतिक उपग्रह था-चंद्रमा। आज पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों की संख्या 15,000 से अधिक हो चुकी है, जिनमें से लगभग 10,000 एलन मस्क की कंपनी 'स्पेसएक्स' के हैं। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति मस्क की योजना 10 लाख और...
Scinece News: 70 साल पहले पृथ्वी का सिर्फ एक ही प्राकृतिक उपग्रह था-चंद्रमा। आज पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों की संख्या 15,000 से अधिक हो चुकी है, जिनमें से लगभग 10,000 एलन मस्क की कंपनी 'स्पेसएक्स' के हैं। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति मस्क की योजना 10 लाख और उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने की है। इनमें से प्रत्येक की लंबाई लगभग 70 मीटर और चौड़ाई करीब 20 मीटर होगी तथा ये मिलकर अंतरिक्ष में डेटा केंद्रों के रूप में काम करने वाला एक विशाल उपग्रह समूह बनाएंगे। लेकिन जितने अधिक उपग्रह होंगे, उतना ही अधिक अंतरिक्ष कचरा भी बढ़ेगा। यह कचरा अब उन महत्वपूर्ण प्रणालियों के लिए खतरा बनता जा रहा है, जिन पर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी निर्भर करती है। इस समस्या का प्रभावी समाधान तीन मोर्चों -प्रौद्योगिकी, नीतियां और दृष्टिकोण पर एक साथ काम करने से ही संभव है।
करीब 13 हजार टन के बराबर अंतरिक्ष कचरा
अंतरिक्ष कचरे से आशय पृथ्वी की कक्षा में मौजूद उन सभी वस्तुओं से है, जिनका अब कोई उपयोग नहीं रह गया है। इनमें इस्तेमाल हो चुके रॉकेट के हिस्से, निष्क्रिय या क्षतिग्रस्त उपग्रह तथा अति सूक्ष्म कण भी शामिल हैं। वर्तमान में पृथ्वी की कक्षा में 10 सेंटीमीटर से बड़े कचरे के करीब 36,000 टुकड़े हैं, जबकि इससे छोटे कणों की संख्या करोड़ों में है।
अनुमान है कि इस पूरे मलबे का कुल वजन 13,486 टन है। इस मलबे में सबसे बड़ा योगदान अमेरिका, रूस और चीन का है। अंतरिक्ष मलबा इसलिए बेहद खतरनाक है क्योंकि यह लगभग सात किलोमीटर प्रति सैकंड की औसत गति से पृथ्वी की निचली कक्षा में घूम रहा होता है। इतनी तेज गति से होने वाली एक टक्कर किसी उपग्रह को पूरी तरह तोड़ सकती है तथा उससे और भी अधिक अंतरिक्ष मलबा पैदा हो सकता है। इसका सबसे भयावह रूप 'केसलर सिंड्रोम' कहलाता है। इसमें एक टक्कर से बना कचरा दूसरे कचरे से टकराता है, फिर उससे और मलबा बढ़ता रहता है और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी की कक्षा का कुछ क्षेत्र उपयोग के लायक नहीं रहेगा और आशंका है कि पृथ्वी का अंतरिक्ष से संपर्क तक बाधित हो जाए। अंतरिक्ष कचरे का खतरा अब मानव अंतरिक्ष अभियानों तक पहुंच चुका है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को हर साल कम से कम एक बार ऐसे कचरे से बचने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। फिलहाल सबसे सामान्य उपाय यह है कि पुराने उपग्रहों और मलबे को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने दिया जाए, जहां वे जलकर नष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, स्टारलिंक का कम से कम एक उपग्रह हर दिन वायुमंडल में जलकर नष्ट हो जाता है। हालांकि, अब इतनी बड़ी संख्या में उपग्रह जलने से कार्बन और एल्युमिना कण पैदा हो रहे हैं, जिनका असर ओजोन परत पर पड़ने लगा है। यही परत हमें सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है।
नयी तकनीक बन सकती है समाधान
तकनीकी उपायों में सक्रिय रूप से अंतरिक्ष कचरा हटाना और उपग्रहों तथा अंतरिक्ष मिशन की बेहतर योजना शामिल है। कचरे को हटाने की तकनीक के तहत पुराने अंतरिक्ष यानों को या तो पृथ्वी के वायुमंडल में धकेल दिया जाता है, जहां वे जलकर नष्ट हो जाते हैं, या फिर उन्हें ऐसी कक्षा में भेज दिया जाता है जहां उपग्रह संचालित नहीं होते। वैज्ञानिकों ने ऐसे 50 सबसे खतरनाक अंतरिक्ष यानों की सूची भी तैयार की है, जिनमें अधिकांश परित्यक्त रॉकेट हैं। कचरा हटाने के लिए जाल, चुंबक, पाल, गुलेल जैसी प्रणालियां और हार्पून जैसी तकनीकों पर काम हो रहा है। हालांकि, इनमें से बहुत कम तकनीकों का अंतरिक्ष में सफल परीक्षण हो पाया है। नए उपग्रह ऐसे पदार्थों से भी बनाए जा सकते हैं जो अधिक टिकाऊ हों, ताकि उनका जीवनकाल बढ़ सके। दूसरी ओर, ऐसे पदार्थों का भी उपयोग किया जा सकता है जो अपना काम पूरा होने के बाद आसानी से नष्ट किए जा सकें और उन्हें जल्दी कक्षा से बाहर लाया जा सके। जापान अंतरिक्ष यान बनाने में लकड़ी के इस्तेमाल का भी परीक्षण कर रहा है। इसके अलावा, उपग्रहों में दोबारा ईंधन भरकर उनकी कार्यावधि बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी काम किया जा रहा है।
बेहतर नीतियों की भी जरूरत
अब नीतियों में भी उपग्रहों के जीवनकाल समाप्त होने के बाद उनके सुरक्षित निस्तारण पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। पहले यह मानक था कि कोई भी अंतरिक्ष यान 25 वर्ष से अधिक मूल कक्षा में नहीं रहना चाहिए। अब इस सीमा को घटाकर पांच वर्ष कर दिया गया है। हालांकि, इसका एक नकारात्मक पक्ष यह है कि अधिक संख्या में अंतरिक्ष यान वायुमंडल में नष्ट होंगे। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) 'शून्य कचरा नीति' को आगे बढ़ा रही है, जबकि 'अंतर-एजेंसी कचरा समन्वय समिति अंतरिक्ष कचरा कम करने संबंधी दिशा-निर्देश जारी करती है। इसके अलावा, अंतरिक्ष कचरे के प्रबंधन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मानक भी है। इस दिशा में अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन के जरिए बेहतर अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष में अतिभार से बचने के लिए ऐसे नियम बनाना है, जिनसे कचरा कम पैदा हो, विभिन्न गतिविधियों में समन्वय बना रहे और सूचनाओं का आदान-प्रदान हो। हालांकि, अभी तक इस संबंध में वैश्विक स्तर पर सर्वमान्य यातायात प्रबंधन व्यवस्था नहीं बन पाई है। इसके बावजूद, अब उपग्रह संचालित करने वाली कंपनियां अपने पर्यावरणीय दायित्वों को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लेने लगी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ इतना पर्याप्त होगा?
अंतरिक्ष के प्रति सोच बदलने की जरूरत
अंतरिक्ष के बारे में अब तक जो सोच रही है, वह मानवता के लिए बहुत लाभकारी साबित नहीं हुई है। अंतरिक्ष कचरे की समस्या के पीछे मुख्य वजहें प्रतिष्ठा की होड़, कक्षीय संसाधनों पर कब्जे की प्रतिस्पर्धा और यह धारणा हैं कि अंतरिक्ष के पर्यावरण के प्रति हमारी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है। अक्सर पृथ्वी की कक्षा को पर्यावरण माना ही नहीं जाता, क्योंकि वहां जीवन मौजूद नहीं है। यही सोच प्रौद्योगिकी क्षेत्र के उन अरबपतियों में भी दिखाई देती है, जो विशाल उपग्रह समूह अंतरिक्ष में स्थापित करने की होड़ में शामिल हैं।
शोध बताते हैं कि पर्यावरण की देखभाल और संरक्षण को अक्सर पुरुषोचित गुण के रूप में नहीं देखा जाता। अब पृथ्वी और अंतरिक्ष को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। अंतरिक्ष कचरे को एक ऐसे परस्पर जुड़े तंत्र के रूप में समझने की जरूरत है, जिसका दायरा समुद्र की तलहटी में स्थित निष्क्रिय अंतरिक्ष यानों के निस्तारण क्षेत्र से लेकर वायुमंडल, पृथ्वी और चंद्रमा की सभी कक्षाओं तक फैला हुआ है। यहां तक कि चंद्रमा की सतह भी अब अंतरिक्ष कचरे से प्रभावित होने लगी है। दार्शनिक वैल प्लमवुड का 'सह-भागीदारी' आधारित पर्यावरण प्रबंधन का दृष्टिकोण इस समस्या को देखने का नया नजरिया देता है।
इसके अनुसार, हमें पर्यावरण से सिर्फ संसाधन लेने के बजाय उसे फलने-फूलने के लिए जरूरी परिस्थितियां भी उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि वह विनाश की कगार पर न पहुंचे। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या 'केसलर सिंड्रोम' भविष्य में सचमुच पृथ्वी का अंतरिक्ष से संपर्क काट देगा। लेकिन आशंका है कि भविष्य में वायुमंडल में जलते अंतरिक्ष कचरे को देखकर नयी कहानियां और नए मिथक जन्म लें। आसमान में इन 'सांस्कृतिक उल्काओं' को देखना शायद आने वाले समय में पूरी मानवता का साझा अनुभव बन जाए।