Edited By Mansa Devi,Updated: 24 Jan, 2026 11:18 AM

भारत में वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का रूप ले चुका है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि जहरीली हवा देश में हर दिन औसतन 4,657 लोगों की जान ले रही है।
नेशनल डेस्क: भारत में वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक संकट का रूप ले चुका है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि जहरीली हवा देश में हर दिन औसतन 4,657 लोगों की जान ले रही है। यह स्थिति न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत भी देती है।
हर साल 17 लाख से ज्यादा मौतें
जिनेवा में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने इस मुद्दे पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत हो रही है। इसका मतलब यह है कि देश में होने वाली हर पांच में से लगभग एक मौत सीधे तौर पर प्रदूषित हवा से जुड़ी हुई है।
सेहत के साथ अर्थव्यवस्था पर भी भारी असर
विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का असर सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह देश की उत्पादकता और अर्थव्यवस्था को भी कमजोर करता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में समय से पहले हुई मौतों और प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण भारत को करीब 36.8 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था, जो देश की जीडीपी का लगभग 1.36 प्रतिशत है।
PM2.5 बना सबसे बड़ा खतरा
हाल ही में जारी वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत की पूरी आबादी हानिकारक PM2.5 कणों के संपर्क में है। ये सूक्ष्म कण हवा में लंबे समय तक बने रहते हैं और सांस के जरिए सीधे फेफड़ों में पहुंचकर गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
दिल, फेफड़े और दिमाग पर सीधा असर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वायु प्रदूषण से स्ट्रोक, दिल की बीमारी, क्रॉनिक लंग डिजीज, फेफड़ों का कैंसर और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कम समय के लिए भी अत्यधिक प्रदूषण में सांस लेना अस्थमा के दौरे, सांस की तकलीफ और फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी का कारण बन सकता है। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए यह खतरा और भी ज्यादा गंभीर माना जा रहा है।
हर साल गहराता संकट
‘द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, यदि भारत में वायु गुणवत्ता WHO के मानकों के अनुरूप होती, तो हर साल करीब 15 लाख अतिरिक्त मौतों को रोका जा सकता था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि केवल फॉसिल फ्यूल के जलने से हर साल लगभग 7.5 लाख लोगों की जान जा रही है, जिसमें कोयला और बायोमास प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वायु प्रदूषण भारत के लिए आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदाओं में से एक बन सकता है।