भारत में तेजी से घटेगी स्कूली बच्चों की संख्या, 2036 तक 20% कम हो सकते हैं प्राइमरी छात्र, आखिर क्यों बदल रही है तस्वीर?

Edited By Updated: 05 Nov, 2026 11:21 PM

the number of school children will decrease rapidly in india

आने वाले समय में भारत के प्राथमिक शिक्षा ढांचे में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा जारी एक नए वर्किंग पेपर 'हाउ इंडिया इज ट्रांसफॉर्मिंग एजुकेशन कैपेसिटी अंडर द न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020' के...

नई दिल्ली: आने वाले समय में भारत के प्राथमिक शिक्षा ढांचे में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा जारी एक नए वर्किंग पेपर 'हाउ इंडिया इज ट्रांसफॉर्मिंग एजुकेशन कैपेसिटी अंडर द न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020' के अनुसार देश में 5 से 9 वर्ष के बच्चों की आबादी में 2011 से 2036 के बीच लगभग 20 प्रतिशत की कमी आने का अनुमान जताया गया है। इस रिसर्च को एसबीआई के मुख्य आर्थिक सलाहकार व EAC-PM के सदस्य सौम्य कांति घोष और अर्थशास्त्री शशिधरण शर्मा ने तैयार किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा की उम्र में बच्चों की यह घटती संख्या भारत में गिरती कुल फर्टिलिटी रेट का पहला जनसांख्यिकी प्रमाण है।

2036 तक 10.02 करोड़ रह जाएगी बच्चों की संख्या 
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुमानों और 2011 की जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 2011 में 5 से 9 साल की उम्र वाले बच्चों की संख्या 12.53 करोड़ थी। यह संख्या 2026 तक 10 प्रतिशत घटकर 11.27 करोड़ और 2036 तक लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट के साथ 10.02 करोड़ रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि देश की फर्टिलिटी रेट 2019 में 2.1 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 पर आ गई है।

ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर शिफ्ट हो रहा नामांकन 
रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की कुल आबादी कम होने के बावजूद देश भर में स्कूलों की मांग एक समान रूप से नहीं घट रही है। 2012-13 से 2021-22 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों (कक्षा 1 से 12) में कुल नामांकन 78 लाख घटकर 18.71 करोड़ से 17.93 करोड़ रह गया। इसके विपरीत, इसी अवधि में शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में 93 लाख नए छात्र जुड़े और वहां नामांकन बढ़कर 7.64 करोड़ पहुंच गया। इसके साथ ही कुल नामांकन में शहरों की हिस्सेदारी 26.4 प्रतिशत से बढ़कर 29.9 प्रतिशत हो गई है।

राज्यवार आंकड़ों में भी बड़ा अंतर देखा गया है। उत्तर प्रदेश में कुल नामांकन लगभग स्थिर रहा, लेकिन ग्रामीण नामांकन 19.46 लाख घटा और शहरी नामांकन 17.6 लाख बढ़ा। बिहार में नामांकन और स्कूलों की संख्या दोनों में बढ़ोतरी हुई, जबकि तमिलनाडु में स्कूलों की संख्या बढ़ने के बाद भी कुल नामांकन में गिरावट दर्ज की गई।

प्राथमिक स्कूलों की संख्या घटी, 12वीं तक के स्कूल बढ़े 
यूडीआईएसई प्लस (UDISE+) के आंकड़ों के अनुसार 2018-19 में देश में कुल 15.51 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 तक 5.4 प्रतिशत घटकर 14.67 लाख रह गए। इसमें केवल कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई कराने वाले प्राथमिक स्कूलों की संख्या 8.27 लाख से 12.6 प्रतिशत घटकर 7.22 लाख रह गई। हालांकि, कक्षा 12वीं तक शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या में 29.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ और ये 1.30 लाख से बढ़कर 1.69 लाख हो गए। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि प्राथमिक स्कूलों की संख्या घटने का मतलब स्कूल बंद होना नहीं, बल्कि उनका विलय होना या अपग्रेड होकर उच्च कक्षाएं जुड़ना है।

NEP 2020 और स्कूल क्लस्टर मॉडल का सुझाव 
छोटे और कम बच्चों वाले स्कूलों में संसाधनों की कमी से निपटने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में स्कूल कॉम्पलेक्स और क्लस्टर मॉडल का सुझाव दिया गया है। इसके तहत आसपास के छोटे स्कूल और आंगनबाड़ी बिना किसी भवन को बंद किए शिक्षकों, लैबोरेट्री और खेल के मैदानों का साझा उपयोग कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि केवल राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर ग्रामीण या दूर-दराज के स्कूलों को बंद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि स्थानीय मांग और बच्चों के लिए स्कूल की दूरी को ध्यान में रखकर योजना बनाई जानी चाहिए।

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