Edited By Niyati Bhandari,Updated: 04 Nov, 2026 08:46 AM

Chhath Puja 2026 Date & Muhurat: 13 नवंबर से शुरू होगा छठ महापर्व। जानें, नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य की सही तिथियां, सूर्योदय-सूर्यास्त का समय और धार्मिक महत्व।
Chhath Puja 2026 Date & Muhurat: लोक आस्था और सूर्य उपासना का सबसे बड़ा महापर्व 'छठ' इस साल 13 नवंबर 2026 से शुरू होने जा रहा है। चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ होकर सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ संपन्न होता है। विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वांचल में मनाया जाने वाला यह व्रत अब देश-विदेश में भी पूरे विधि-विधान के साथ मनाया जाता है। छठ पर्व को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और निरोगी काया के लिए 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखते हैं।

Chhath Puja 2026 Calendar: सूर्योदय समय (नई दिल्ली अनुमानित) सुबह 6:44 बजे (स्थान के अनुसार समय में अंतर हो सकता है)
सूर्यास्त समय (नई दिल्ली अनुमानित): शाम 5:28 बजे (स्थान के अनुसार समय में अंतर हो सकता है)

छठ महापर्व 2026 का पूरा शेड्यूल
पहला दिन: नहाय-खाय (13 नवंबर 2026)
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रत करने वाले के खाने के बाद ही वब भी खाना खाते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।
दूसरा दिन: खरना (14 नवंबर 2026)
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर 2026)
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रत रखने वाले के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग पैदल ही सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठ का व्रत रखने वाले एक तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य व पारण (16 नवंबर 2026)
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। व्रत रखने वाले फिर वहीं इक्ट्ठा होते हैं जहां उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। फिर पिछले शाम की प्रक्रिया की दोहराई जाती है। अंत में कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूरा करते हैं।
