अब इन दवाइयों के 30% तक बढ़ सकते हैं दाम, जानें बड़ी वजह

Edited By Updated: 11 Mar, 2026 08:30 PM

the prices of these medicines may increase by up to 30

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष का असर अब भारत के फार्मास्यूटिकल सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब दो हफ्तों में दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, यानी एक्टिव फार्मास्यूटिकल...

नेशनल डेस्क  : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष का असर अब भारत के फार्मास्यूटिकल सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक पिछले करीब दो हफ्तों में दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, यानी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API), की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई मामलों में इनकी कीमतें लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में दवाओं के दाम बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है।

चीन से सप्लाई प्रभावित, उत्पादन पर बढ़ा दबाव

फार्मा उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा हालात में समुद्री परिवहन व्यवस्था पर असर पड़ा है और कंटेनर जहाजों की उपलब्धता कम हो गई है। इसका सीधा असर चीन से आने वाले कच्चे माल की सप्लाई पर पड़ा है। चीन भारतीय दवा कंपनियों के लिए API का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। सप्लाई चेन में रुकावट आने से घरेलू दवा निर्माताओं पर उत्पादन बनाए रखने का दबाव बढ़ गया है। अगर लागत लगातार बढ़ती रही तो कंपनियों को दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी करने की जरूरत पड़ सकती है।

कई अहम कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ीं

उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार कई महत्वपूर्ण कच्चे पदार्थों के दाम तेजी से ऊपर गए हैं। उदाहरण के तौर पर दिसंबर के बाद से ग्लिसरीन की कीमतों में करीब 60 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली दवा पैरासिटामोल के कच्चे माल की कीमतों में भी लगभग 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई फार्मास्यूटिकल सॉल्वेंट्स, जो पेट्रोकेमिकल उत्पादों से बनते हैं, उनकी कीमतें भी एक सप्ताह के भीतर 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।

तेल कीमतों का असर भी बढ़ा रहा लागत

विशेषज्ञों के मुताबिक मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर वैश्विक तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण पेट्रोकेमिकल उत्पादों की लागत बढ़ रही है, जो फार्मा इंडस्ट्री के लिए जरूरी कच्चा माल तैयार करने में इस्तेमाल होते हैं। इससे दवा निर्माण की कुल लागत बढ़ने लगी है।

सरकार से राहत की मांग

फार्मा कंपनियों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो उद्योग के लिए लागत को संभालना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से दवा निर्माताओं ने सरकार से कुछ दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की अनुमति देने की मांग की है। उद्योग का तर्क है कि भारत में दवाओं की कीमतें काफी हद तक सरकारी नियंत्रण में रहती हैं, ऐसे में कच्चे माल की अचानक बढ़ी कीमतों का बोझ कंपनियों के लिए अकेले उठाना कठिन हो सकता है।

शिपिंग लागत बढ़ने से सप्लाई पर खतरा

मौजूदा संघर्ष का असर वैश्विक शिपिंग नेटवर्क पर भी पड़ा है। कई समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने के कारण माल ढुलाई महंगी हो गई है। कुछ मामलों में फ्रेट चार्ज लगभग दोगुना तक हो गया है और हर शिपमेंट पर 4,000 से 8,000 डॉलर तक अतिरिक्त लागत जुड़ रही है।

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