Edited By Ramkesh,Updated: 06 Sep, 2026 12:55 PM

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और डीप टेक के इस दौर में देश की नई पीढ़ी तेजी से आगे बढ़ रही है। हालांकि, देश की राजनीति और नीति-निर्माण...
नई दिल्ली: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और डीप टेक के इस दौर में देश की नई पीढ़ी तेजी से आगे बढ़ रही है। हालांकि, देश की राजनीति और नीति-निर्माण में युवाओं की भागीदारी अब भी काफी सीमित है। राजनीतिक विश्लेषक और 'I-YUVA' के संस्थापक रूद्र प्रताप सिंह के अनुसार, वर्तमान में भारतीय राजनीति के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां 'परिवारवाद' और 'उम्रदराज नेतृत्व' (बुजुर्गवाद) हैं।
परिवारवाद से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' का संकट
लोकतंत्र की बुनियाद समान अवसर और पारदर्शिता पर टिकी है, लेकिन जब राजनीतिक दलों में अवसर का आधार योग्यता के स्थान पर परिवार का प्रभाव या विरासत बन जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। एक आम युवा को पहचान बनाने, संगठन में काम करने और संसाधन जुटाने में वर्षों संघर्ष करना पड़ता है, जबकि राजनीतिक परिवारों से आने वाले व्यक्तियों को पहचान और संसाधनों का सीधा लाभ मिल जाता है। यह अंतर राजनीति में सामान्य और प्रतिभाशाली युवाओं के लिए अवसरों को बेहद सीमित कर देता है।
अनुभव और युवा ऊर्जा के बीच संतुलन की आवश्यकता
भारत की विशाल युवा जनसंख्या के बावजूद संसद और नीति-निर्माण में बुजुर्ग नेतृत्व का प्रभाव अधिक है। यद्यपि अनुभवी नेताओं के पास प्रशासन का लंबा अनुभव होता है और उम्र किसी की क्षमता का एकमात्र पैमाना नहीं है, लेकिन तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, साइबर सुरक्षा और गिग इकोनॉमी जैसे आधुनिक विषयों पर नई पीढ़ी की सोच और प्रतिनिधित्व बेहद जरूरी है। असल चुनौती अनुभवी नेताओं को हटाने की नहीं, बल्कि अनुभव और युवा ऊर्जा के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की है।
राजनीतिक संस्कृति में बदलाव और समाधान के रास्ते
यदि शिक्षित और सक्षम युवा राजनीति से खुद को अलग-थलग महसूस करेंगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में नई प्रतिभाओं का अभाव हो जाएगा। इस स्थिति को बदलने के लिए राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में पारदर्शिता लानी होगी, पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना होगा और केवल विरासत के बजाय जमीनी काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाना होगा। लोकतंत्र में पहचान से ज्यादा जनविश्वास, विरासत से ज्यादा प्रदर्शन और उम्र से ज्यादा क्षमता को महत्व मिलना ही भारत को भविष्य के लिए तैयार कर सकता है।