Edited By Anu Malhotra,Updated: 08 Jul, 2026 01:32 PM

Woman Died 8 days after take Life Insurance: आंध्र प्रदेश के उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में बीमा कंपनी को मृत महिला के परिवार को कुल 20.25 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि महिला ने बीमा लेते समय अपनी...
Woman Died 8 days after take Life Insurance: आंध्र प्रदेश के उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में बीमा कंपनी को मृत महिला के परिवार को कुल 20.25 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि महिला ने बीमा लेते समय अपनी किसी पुरानी बीमारी की जानकारी छिपाई थी। ऐसे में बीमा दावा (क्लेम) खारिज करना गलत था।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, यह मामला एक महिला की मौत से जुड़ा है, जिनका निधन बीमा पॉलिसी लेने के सिर्फ 8 दिन बाद हो गया था। उनके पति और तीन बेटों ने बीमा राशि के लिए आयोग का दरवाजा खटखटाया था। परिवार के अनुसार, महिला ने 1 दिसंबर 2022 को 20 लाख रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। इसके लिए 3,122 रुपये का प्रीमियम जमा किया गया और उसी दिन से पॉलिसी लागू हो गई। महिला ने अपने पति को पॉलिसी का नॉमिनी बनाया था। परिजनों का कहना था कि पॉलिसी जारी करने से पहले बीमा कंपनी ने महिला की स्वास्थ्य संबंधी जांच की थी और पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही बीमा मंजूर किया था। लेकिन 9 दिसंबर 2022 को अचानक हार्ट स्ट्रोक आने से 34 साल महिला की मौत हो गई। परिवार का दावा था कि महिला पूरी तरह स्वस्थ थीं और उन्हें पहले कभी कोई गंभीर बीमारी नहीं थी। इसके बाद पति ने सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ बीमा क्लेम दाखिल किया।
बीमा कंपनी ने क्यों ठुकराया क्लेम?
बीमा कंपनी ने अगस्त 2023 में क्लेम को अस्वीकार कर दिया। कंपनी का कहना था कि महिला ने बीमा आवेदन भरते समय अपनी स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई थी। कंपनी के मुताबिक, महिला को पहले से सीने में दर्द और एनीमिया की समस्या थी, जिसकी जानकारी नहीं दी गई। कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि महिला ने बीमारी छिपाकर बीमा पॉलिसी हासिल की थी, इसलिए क्लेम मंजूर नहीं किया जा सकता।
आयोग ने क्या पाया?
सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी जिन मेडिकल रिकॉर्ड और लैब रिपोर्ट पर भरोसा कर रही थी, वे सही तरीके से प्रमाणित नहीं थीं। आयोग ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं होता कि वे रिकॉर्ड वास्तव में उसी महिला के थे। आयोग ने यह भी माना कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि महिला को पॉलिसी लेने से पहले एनीमिया या कोई अन्य गंभीर बीमारी थी। इसलिए बीमारी छिपाने का आरोप साबित नहीं हुआ।
आयोग का आदेश
आयोग ने बीमा कंपनी को परिवार को 20 लाख रुपये की बीमा राशि देने का आदेश दिया। यह रकम महिला के पति और तीनों बेटों के बीच बराबर-बराबर, यानी 5-5 लाख रुपये के हिसाब से बांटी जाएगी। चूंकि तीनों बेटे नाबालिग हैं, इसलिए उनकी हिस्सेदारी उनके नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में जमा की जाएगी। उनके पिता को अभिभावक बनाया जाएगा और बच्चों के बालिग होने पर उन्हें यह राशि मिलेगी। इसके अलावा आयोग ने बीमा कंपनी को 20 हजार रुपये मानसिक पीड़ा और सेवा में कमी के लिए तथा 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने का आदेश दिया। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि बीमा कंपनी महिला द्वारा बीमारी छिपाने का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी। ऐसे में क्लेम को अस्वीकार करना उचित नहीं था। कंपनी के इस फैसले से परिवार को आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी उठानी पड़ी।