पुतिन की भारत यात्रा पर यूरोप नाराज! जयशंकर ने दिया मुंहतोड़ जवाब, 'गलतियों का दोष हम पर न मढ़ें'

Edited By Updated: 03 Dec, 2025 08:46 PM

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इंडिया ग्लोबल फोरम में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पश्चिमी देशों की प्रवासी विरोधी सोच पर करारा हमला किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अमेरिका और यूरोप की आर्थिक समस्याओं के लिए प्रवासियों को दोष देना गलत है, क्योंकि उनके बिजनेस आउटसोर्स करने की रणनीति ही...

नेशनल डेस्क : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा को लेकर अमेरिका ही नहीं, यूरोप के कई बड़े देश भी खुलकर नाराजगी जता रहे हैं। इसी बीच रूस संग ब्रह्मोस मिसाइल के एडवांस वर्जन पर भी समझौता संभव हो सकता है। इसके बाद नाराजगी और बढ़ सकती है। जिसे लेकर ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के राजनयिकों ने संयुक्त लेख लिखकर भारत की विदेश नीति पर अप्रत्यक्ष सवाल खड़े किए, जिसे भारत ने अपनी संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादा पर हमला माना। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर पश्चिमी देश अपनी रवैये से बाज नहीं आए, तो नुकसान उनका ही होगा।

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह पुतिन की सबसे दुर्लभ विदेश यात्राओं में से एक है। पिछले तीन वर्षों से अमेरिका और यूरोप पुतिन को वैश्विक मंच से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत जब पुतिन का ‘रेड कार्पेट’ वेलकम करता है, तो पश्चिमी देशों की यह मुहिम कमजोर साबित होती दिखती है। यही कारण है कि पुतिन के दिल्ली पहुंचने से पहले ही यूरोप के तीन बड़े देशों ने अपना ‘नाराजगी अभियान’ शुरू कर दिया।

भारत में तैनात ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरून, फ्रांस के राजदूत थिएरी मथौ और जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने एक साझा लेख लिखकर पुतिन को यूक्रेन युद्ध का ‘विलेन’ बताया और कहा कि रूस शांति चाहता ही नहीं। भारत ने इस लेख पर कड़ा आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि यह कूटनीतिक मर्यादा से परे है।

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पुतिन को अलग-थलग करने का प्लान फेल – भारत के स्वागत ने पश्चिम की रणनीति को कमजोर कर दिया।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता – भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपने हितों के आधार पर निर्णय लेगा।

सस्ते रूसी तेल से यूरोप की नाराजगी – भारत की खरीद ने उनके प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कम कर दी।

पुतिन को ‘वार क्रिमिनल’ न मानने पर चिढ़ – भारत का सम्मानजनक व्यवहार पश्चिम के नैरेटिव को खारिज करता है।

मोदी के बयान का गलत इस्तेमाल न हो पाना – भारत स्पष्ट कर चुका है कि ‘यह युद्ध का युग नहीं’ शांति का संदेश था।

ग्लोबल साउथ की भावना बदलने का डर – भारत के रुख से कई विकासशील देश पश्चिम के दबाव को ठुकरा सकते हैं।

रक्षा सौदों पर खतरा – भारत–रूस रक्षा सहयोग मजबूत होने से पश्चिमी हथियार कंपनियां असहज हैं।

भारत की कूटनीतिक बेबाकी – भारत ने यूरोप की श्रेष्ठता मानसिकता को चुनौती दी है।

रूस–चीन गठबंधन की चिंताएं – भारत रूस को चीन के पक्ष में झुकने से रोकने वाली अहम शक्ति है।

भारत की सख्त प्रतिक्रिया से यूरोप की हदें याद दिलाना – राजदूतों के लेख पर भारत की कड़ी आपत्ति अप्रत्याशित थी।

जयशंकर की दो टूक—“हम पर दोष मढ़ना बंद करें”
पश्चिमी देशों के राजदूतों द्वारा भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाने वाले संयुक्त लेख के बाद अब भारत ने मोर्चा संभाल लिया है। इसी बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘इंडिया ग्लोबल फोरम’ में एक अलग ही मंच से अमेरिका और यूरोप को सीधा संदेश देते हुए स्पष्ट कर दिया कि भारत अब आरोप सुनने के मूड में नहीं है, बल्कि जवाब देने की स्थिति में है।

जयशंकर ने माइग्रेशन और टैलेंट पर बढ़ते पश्चिमी दबाव की आलोचना करते हुए कहा कि पश्चिमी देशों में बढ़ती आर्थिक दिक्कतों की जिम्मेदारी प्रवासियों पर थोपना गलत है। उन्होंने कहा कि पिछले 20 वर्षों में अमेरिका और यूरोप ने खुद अपने बिज़नेस और मैन्युफैक्चरिंग को विदेशों में शिफ्ट किया था, जिससे स्थानीय नौकरियों में कमी आई। जयशंकर ने तीखे शब्दों में कहा “अपनी गलतियों का ठीकरा हम पर मत फोड़िए। आपकी आर्थिक समस्याओं के लिए प्रवासी जिम्मेदार नहीं हैं।”

विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि आज दुनिया ‘नॉलेज इकोनॉमी’ के युग में है और अगर पश्चिमी देश टैलेंट के प्रवाह में बाधाएं खड़ी करेंगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं को होगा। उन्होंने साफ कहा कि भारत को किसी की दया की जरूरत नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों को भारत की स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है।
 

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