आपकी 7 लाख की कार कैसे 10 लाख तक पहुंच जाती है? जानें इसके पीछे शोरूम वालों का असली खेल

Edited By Updated: 11 Dec, 2025 02:35 PM

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7 लाख की कार की कीमत अक्सर शोरूम से निकलते-निकलते 10 लाख तक पहुंच जाती है, जिसकी वजह डीलरशिप के महंगे एक्सेसरी पैक होते हैं। अलॉय व्हील, कैमरा, टचस्क्रीन, सीट कवर, बॉडी किट और क्रोम पैक जैसे ऐड-ऑन वास्तविक कीमत में 1 से 3 लाख रुपये तक का इजाफा कर...

नेशनल डेस्क : कार खरीदने वाले कई ग्राहकों ने यह अनुभव किया है कि शोरूम में 7 लाख रुपये की दिखाई देने वाली कार की कीमत घर तक पहुंचते-पहुंचते 10 लाख रुपये तक कैसे पहुंच जाती है। इसकी सबसे बड़ी वजह वे एक्सेसरीज़ हैं, जिन्हें डीलरशिप अनिवार्य बताते हुए बिल में जोड़ देती हैं। अलॉय व्हील्स, रिवर्स कैमरा, पार्किंग सेंसर, इंटीरियर किट, क्रोम गार्निश जैसी चीजें कार को जितना प्रीमियम दिखाती हैं, उतना ही उपभोक्ता की जेब पर भारी पड़ती हैं। यही अतिरिक्त सुविधाएं कई बार कार की कुल कीमत में 2 से 3 लाख रुपये तक का भार बढ़ा देती हैं।

कई ग्राहक इन एक्स्ट्रा चार्जेस से तब हैरान होते हैं, जब बिल में अचानक 7 लाख की कार 9.50 या 10 लाख रुपये की दिखने लगती है। यही वह ‘मैजिक ट्रिक’ है, जिससे कार की अंतिम कीमत चुपचाप बढ़ जाती है।

एक्सेसरी पैक: कीमत बढ़ने का असली कारण
ग्राहक अक्सर यह मानकर कार की एक्स-शोरूम कीमत देखते हैं कि यही अंतिम लागत होगी। लेकिन डीलरशिप पहुंचने के बाद उन्हें बताया जाता है कि यह बेस वेरिएंट है और इसमें “कुछ खास फीचर नहीं” हैं। फिर उन्हें एक अनिवार्य एक्सेसरी पैक खरीदने का सुझाव दिया जाता है, जिसकी कीमत 20,000 रुपये से शुरू होकर 1.50 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। कुछ हाई-डिमांड मॉडलों में यह राशि 2 से 3 लाख रुपये तक भी चली जाती है।

कौन-सी एक्सेसरीज़ बढ़ाती हैं कार की कीमत?

1. अलॉय व्हील्स (₹25,000–₹60,000)
बेस वेरिएंट में अक्सर स्टील व्हील दिए जाते हैं। डीलर इन्हें प्रीमियम लुक के लिए आवश्यक बताते हुए पैक में शामिल कर देते हैं।

2. रिवर्स कैमरा और सेंसर (₹8,000–₹25,000)
इन्हें सुरक्षा के लिए जरूरी बताया जाता है, जबकि आफ्टरमार्केट में यह आधी कीमत में उपलब्ध होते हैं।

3. टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम (₹15,000–₹45,000)
साधारण म्यूजिक सिस्टम वाले बेस मॉडल में डीलर बड़ी स्क्रीन लगाने का दबाव बनाते हैं, जिससे कीमत तुरंत बढ़ जाती है।

4. क्रोम पैक (₹5,000–₹12,000)
डोर हैंडल, ग्रिल और विंडो लाइन पर क्रोम स्ट्रिप्स जोड़कर प्रीमियम लुक बेचने की कोशिश की जाती है।

5. सीट कवर और फ्लोर मैट (₹4,000–₹20,000)
ये बाहर आधी कीमत में मिलते हैं, लेकिन शोरूम में प्रीमियम बताकर महंगे बेचे जाते हैं।

6. बॉडी किट (₹12,000–₹40,000)
स्कफ प्लेट, स्पॉइलर और साइड मोल्डिंग जैसी चीजें डिज़ाइन के नाम पर बिल में जुड़ जाती हैं।

कैसे 7 लाख की कार 10 लाख हो जाती है

अगर किसी कार की एक्स-शोरूम कीमत ₹7,00,000 है, तो डीलर द्वारा सुझाए गए एक्सेसरी पैक कुछ इस तरह हो सकते हैं:

अलॉय व्हील — ₹40,000

रिवर्स कैमरा + सेंसर — ₹15,000

टचस्क्रीन सिस्टम — ₹35,000

सीट कवर — ₹8,000

फ्लोर मैट — ₹2,000

बॉडी किट — ₹20,000

क्रोम पैक — ₹8,000

अन्य छोटे ऐड-ऑन — ₹10,000

कुल अतिरिक्त लागत: ₹1,38,000

इसके बाद यदि प्रीमियम पैक जोड़ा जाए, तो कीमत 2 से 3 लाख रुपये तक बढ़ सकती है। नतीजतन 7 लाख की कार की ऑन-रोड कीमत आसानी से ₹9.50–10 लाख तक पहुंच जाती है।

10 लाख से कम की कारों में क्यों होता है यह ट्रेंड?

यह ट्रेंड खासकर इन कार मॉडलों में देखा जाता है:

मारुति स्विफ्ट

मारुति बलेनो

हुंडई i20

टाटा पंच

रेनो काइगर

निसान मैग्नाइट

इनमें बेस वेरिएंट की कीमत आकर्षक रखी जाती है, लेकिन ज़रूरी एक्सेसरीज़ जोड़ते-जोड़ते कीमत काफी बढ़ जाती है।

ग्राहक क्या करें?

ज़रूरी एक्सेसरीज़ आफ्टरमार्केट से 30–40% कम कीमत में लगवाई जा सकती हैं।

डीलर से सिर्फ सुरक्षा फीचर्स ही लें।

कार खरीदते समय एक्स-शोरूम और ऑन-रोड कीमत का पूरा अंतर पहले ही स्पष्ट पूछें।

7 लाख की कार 10 लाख इसलिए हो जाती है क्योंकि एक्सेसरीज़ का खेल सबसे बड़ा होता है। कंपनियां बेस वेरिएंट को कम कीमत पर लॉन्च करती हैं, लेकिन डीलर एक्सेसरी पैक के ज़रिए असल कीमत बढ़ा देते हैं।

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