धर्म और आस्था में टकराव बेबुनियाद

Edited By , Updated: 21 May, 2022 05:35 AM

conflict between religion and faith baseless

धर्म वही जो जन्म से मिले या मन को अच्छा लगे और उसे मानने, पूजने से चित्त शांत हो, दूसरों के प्रति कटुता और कड़वाहट न हो। यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन यदि वह लड़ाई झगड़े, बहस

धर्म वही जो जन्म से मिले या मन को अच्छा लगे और उसे मानने, पूजने से चित्त शांत हो, दूसरों के प्रति कटुता और कड़वाहट न हो। यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है लेकिन यदि वह लड़ाई झगड़े, बहस और विवाद से लेकर जीने-मरने का कारण बन जाए और उसके लिए नफरत, मारपीट, हिंसा होने लगे तो समझना चाहिए कि इस तरह का वातावरण तैयार करने में किसी का निजी स्वार्थ है, अपने को बेहतर सिद्ध कर दूसरे को नीचा दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने की साजिश है! 

धार्मिक आस्था : जब धर्म है तो उसके प्रति आस्था और विश्वास होना भी अनिवार्य है। इसी तरह अपने धर्म के लिए बनी पूजा का विधि-विधान भी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भिन्न-भिन्न स्थानों पर यह अलग-अलग है क्योंकि इसमें स्थानीय भाषा, परंपरा, रीति-रिवाज और तौर तरीके मिल जाते हैं। यही कारण है कि पूजा के लिए कहीं मानवीय आकृति दिखाई देती है तो कहीं कोई शिलाखंड ही पूजा जाने लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर का कोई रूप नहीं, वह निराकार है और साधक या पूजा करने वाले के मन में अपने आराध्य की बनी छवि के अनुसार निरंतर बदलता रहता है। 

दूसरा कारण है कि जब किसी मनुष्य का आचरण, व्यवहार और उसके कार्य मन में निर्मित ईश्वर के स्वरूप के अनुसार होते दिखाई देते हैं या जिनके बारे में पढ़ा और सुना होता है तो वह हमारे लिए पूज्य हो जाता है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक से लेकर हजरत मोहम्मद और ईसा मसीह तक और इसी तरह विश्व के अनेक धर्मों के महापुरुष हमारे आराध्य पुरुष और इसी कड़ी में अपने शौर्य, पराक्रम से शत्रु विनाशक स्त्री पात्र हमारे लिए क्रमश: भगवान और देवी का स्वरूप बन जाते हैं। 

ये हमारे आदर्श हो जाते हैं और हमें उनके कार्य अलौकिक, आश्चर्यजनक और अद्भुत लगते हैं। हम अपने मन में उनकी ऐसी छवि का निर्माण कर लेते हैं जिसके विरोध में या उसके प्रति किसी प्रकार का अनादर करने या उसकी छवि धूमिल करने के किसी भी प्रयास को अपना स्वयं का अपमान समझकर उस व्यक्ति से बदला लेने से लेकर उसकी हैसियत को नेस्तनाबूद करने तक के बारे में सोचने लगते हैं। मौका मिला नहीं कि बिना सोचे-समझे कोई न कोई एेसा काम कर बैठते हैं जिसका परिणाम अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है। 

शासक की चाल : इतिहास गवाह है कि मनुष्य की इसी आस्था और उसके विश्वास को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से शासक वर्ग ऐसे काम करता रहा है जिनका असर शताब्दियों तक कायम रहता है। वरना क्या कारण है कि किसी अन्य धर्म के पूजास्थल को तोड़कर या उसके बगल में कोई शासक अपने धर्म के प्रतीक धार्मिक स्थल का निर्माण वहीं करता। उसके मन में दोनों धर्मों के बीच सौहार्द और भाईचारा कायम रखने की बात रही हो या फिर अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ हो अथवा उसका कोई ऐसा मंसूबा रहा हो जिसका असर पीढ़ी दर पीढ़ी पड़ने वाला हो।

यह एक वास्तविकता है चाहे किसी भी धर्म के धार्मिक स्थल हों, वे या तो ऐसी जमीन पर बने होंगे जो समतल और कभी किसी भी उपयोग में न लाई गई हो अथवा ऐसे स्थान पर जहां आने जाने की सुविधाएं उपलब्ध हों, नदी आसपास हो और खाने-पीने की वस्तुएं आसानी से मिल जाती हों, साथ में वहां विश्राम करने या कुछ समय रहने की व्यवस्था हो। यह वैसा ही है जैसा किसी नए शहर के निर्माण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाता है कि वह स्थल बसाए जाने योग्य है अथवा नहीं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वहां कभी कोई ढांचा रहा होगा या कुछ एेसा बना होगा जो उस जगह के अतीत की गवाही देता हो जिसे समझकर उस स्थान के इतिहास का बोध होता हो। विचार करने वाली बात यह है कि क्या प्राचीन काल में घटी किसी घटना की जिम्मेदारी वर्तमान समय में किसी समाज पर डाली जा सकती है? 

हमारे देश में मुगल साम्राज्य का विस्तार हमलावर मानसिकता के साथ हुआ था लेकिन जब मुगलों को लगा होगा कि अब यही हमारा वतन है तो उन्होंने हिंदुओं के साथ मेल मिलाप करने और उनके साथ रोटी बेटी का संबंध स्थापित करने तथा संघर्ष के स्थान पर मिलजुल कर रहने की बात सोची होगी। यही कारण है कि जब अंग्रेज आए तो हिंदू और मुसलमान दोनों ही ने उनका मुकाबला किया। 

यह बात सोचने वाली है कि ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में धार्मिक स्थलों से अधिक यहां ऐसे निर्माण करने को प्राथमिकता दी जो देश पर उनके शासन को अधिक सुविधाजनक बना सकें। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और दूसरे नगरों में अंग्रेजों के बनाए भवनों को देखने से यही लगता है कि उनकी प्रवृत्ति अपने धर्म का विस्तार कम और शासन करने की अधिक थी। इसके विपरीत मुस्लिम और हिंदू शासक अपने धर्म के प्रतीकों और धार्मिक स्थलों के निर्माण को प्राथमिकता देते थे। यही क्रम आज भी जारी है और प्रशासन इसी भावना का लाभ उठाते हुए नागरिकों को धर्म में उलझाकर ऐसा माहौल बनाने में सफल हो जाता है जिससे उनकी प्राथमिकताएं बदल जाएं। 

इससे जरूरी समस्याओं से उसका ध्यान भटकाया जा सकता है, यह एक बार नहीं अनेक बार प्रमाणित हो चुका है। क्या कभी ऐसा भी समय आ सकता है जब सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध तथा अन्य धर्मों के प्रतीक धार्मिक स्थलों के निर्माण के बारे में यह जानकारी मिलते ही कि उनका निर्माण किसी अन्य धर्म के प्रतीक स्थल, किसी प्राचीन ढांचे के ऊपर या उसका विध्वंस करने पर हुआ है तो क्या उसकी भी खुदाई कराई जाएगी? एेसा समय आया तो यह वास्तव में देश के लिए और अधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा।-पूरन चंद सरीन
 
 

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