सुप्रीमकोर्ट को सुप्रीम ही रहने दो

Edited By Updated: 03 Feb, 2023 04:52 AM

let the supreme court be supreme

इंदिरा गांधी जन्मजात नेता थीं। नरेंद्र मोदी भी जन्मजात नेता हैं। इंदिरा एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहती थीं। मोदी भी प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहते हैं। इंदिरा उन न्यायाधीशों को पीछे छोड़ती चली गईं, जिनके बारे में वह जानती थीं कि वे उनकी नीतियों का...

इंदिरा गांधी जन्मजात नेता थीं। नरेंद्र मोदी भी जन्मजात नेता हैं। इंदिरा एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहती थीं। मोदी भी प्रतिबद्ध न्यायपालिका चाहते हैं। इंदिरा उन न्यायाधीशों को पीछे छोड़ती चली गईं, जिनके बारे में वह जानती थीं कि वे उनकी नीतियों का समर्थन नहीं करेंगे अगर वे संविधान द्वारा खींची गई रेखाओं को पार करती हैं। नरेंद्र मोदी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में अधिक सूक्ष्म हैं। उनके पास कानून मंत्री किरण रिजिजू हैं जो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में बैठे सभी न्यायाधीश उनकी चाकरी करें। 

बेचारे रिजिजू! उन्होंने खेल और अन्य मंत्रालयों में अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन कानून और न्यायपालिका पोर्टफोलियो में वह असफल ही रहे। सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीशों से लेकर  सुप्रीमकोर्ट के कालेजियम (एस.सी.सी.) सरकार के हाथों में है। 

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी हैं। जब पिछला दांव विफल हो जाता है तो रिजिजू हर कुछ दिनों में एक नया दांव आजमाते हैं। वह खुद को ऐसे व्यक्ति के तौर पर साबित करना चाहते हैं जो अपना भविष्य खुद तय करता है। मैं उनके अच्छे होने की कामना करता हूं लेकिन लोगों की कीमत पर नहीं। एक ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ उन नियंत्रणों और संतुलनों को समाप्त कर देगी जो एक लोकतंत्र को न्याय के एक मामूली आश्वासन की आवश्यकता होती है। 

यदि न्यायपालिका को मीडिया जैसे अन्य संस्थानों की तरह गुलाम बनाया जाता है जो पहले ही झुके हुए हैं या झुकने वाले हैं (कुछ अपनी इच्छा के विरुद्ध), तो यह देश एक निरंकुश राज्य बनने की राह पर होगा। हमें पहले ही बताया जा रहा है कि हमें क्या पहनना चाहिए, हमें क्या खाना चाहिए और आपको किससे प्यार करना चाहिए। यदि न्यायपालिका यह सोचना बंद कर देती है, जैसा कि उसे कानून और संविधान के अनुसार करना चाहिए तो आपका जीवन और स्वतंत्रता दाव पर होगी। 

सुप्रीमकोर्ट के पूर्व जस्ट्सि मदन लोकुर ने एक ऑनलाइन प्रकाशन में लिखे निबंध में रिजिजू को दोषी मानने वाले विभिन्न असत्यों को ग्राफिक विस्तार से बताया है। मैं पाठकों से इस निबंध को पढऩे और मौजूदा व्यवस्था को बदलने में शामिल खतरे के बारे में खुद को समझाने का आग्रह करता हूं। एस.सी.सी. प्रणाली, प्रस्तावित एन.जे.ए.सी. की तरह या प्रणालियां जो अब उन्नत लोकतंत्रों में प्रचलित है, कभी भी सही नहीं हो सकती हैं। लेकिन यह परिस्थिति में सबसे अच्छी है। न्यायाधीश कम से कम राजनीतिक नहीं है। हालांकि उनकी खुद की अपनी प्राथमिकताएं हैं। 

एस.सी.सी. की लगातार आलोचना होती है। यह प्रणाली अपारदर्शी है। कालेजियम का गठन करने वाले केवल 5 वरिष्ठतम न्यायाधीश ही बता सकते हैं कि क्यों एक उम्मीदवार का चयन किया गया और दूसरे को खारिज कर दिया गया। रिजिजू ने इस अप्रत्यक्ष कदम पर नाराजगी जताई कि आई.बी. तथा अन्य केंद्रीय खुफिया एजैंसियों को कभी भी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। यदि रिजिजू कुछ नामितों के प्रति सरकार के अविश्वास के कारणों को छिपाना चाहते हैं तो इससे सरकार को यह कहने में मदद मिलेगी कि उसने आई.बी. द्वारा बताए गए कारणों के लिए नामांकन को खारिज कर दिया था। यह उस लोकप्रिय समझ को दूर कर देगा कि सरकार केवल उन न्यायाधीशों को चाहती है जो उसकी लाइन को मानते हैं और निष्पक्ष तथा न्यायपूर्ण नहीं हैं! 

जाहिर-सी बात है कि सरकार यह नहीं बताना चाहती कि उसकी खुफिया एजैंसियां भी उसके इशारे पर चलने को बेताब हैं! खुलासे में कहा गया है कि एस.सी.सी. अब भारत सरकार के कानून मंत्रालय के साथ अपने विवाद के कारण बना है। खुफिया रिपोर्ट में व्यक्त की गई आपत्तियां सरकार द्वारा अपेक्षित तर्ज पर हैं। जब से धनंजय चंद्रचूड़ मुख्य न्यायाधीश बने हैं तब से कानून मंत्रालय जिसका मार्गदर्शन करने के लिए रिजिजू हैं, विशेष रूप से शत्रुतापूर्ण हो गया है! सरकार के आग्रह पर पुनॢवचार के बाद जो भी सिफारिशें दोहराई जाती हैं उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार पूर्ण रूप से स्वीकार करना होता है। सरकार स्पष्ट रूप से यह स्पष्ट करने के लिए अपने पैर खींच रही है कि कुछ स्वतंत्र विचारधारा वाले कानूनी दिग्गज ‘अवांछित व्यक्ति’ हैं। न्यायमूर्ति लोकुर ने आदित्य सोंधी के मामले का उल्लेख किया है, जिन्होंने अपनी सहमति वापस ले ली थी। जब उनकी नियुक्ति को एक वर्ष से अधिक समय तक ठंडे बस्ते में रखा गया था। 

यदि सरकार जस्टिस मुरलीधर जैसे कुछ जजों से नाराज है तो मुख्य न्यायाधीशों के अंतर उच्च न्यायालय तबादलों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है जिनका एकमात्र दोष यह था कि उन्होंने एक मंत्री और अन्य भाजपा नेताओं के खिलाफ एफ.आई.आर. पर जोर दिया। न्यायमूर्ति लोकुर ने अपने शोध प्रबंध के माध्यम से साबित किया कि रिजिजू का यह तर्क कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां न्यायाधीशों के चयन में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, पूरी तरह से गलत है। उन्होंने जिन उदाहरणों का हवाला दिया उन्होंने इस तथ्य को साबित कर दिया कि सरकार वास्तव में पूरी कवायद में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थी। सरकार स्पष्ट रूप से स्वतंत्र दिमाग वाले न्यायाधीश नहीं चाहती है और यह केवल वर्तमान मुख्य न्यायाधीश और  एस.सी.सी. में उनके सहयोगी है जो प्रभावी रूप से यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोकतंत्र का यह अंतिम गढ़ अपने कार्यकाल के दौरान आत्मसमर्पण नहीं करेगा।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी) 
 

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