गुरु जी की शिक्षाएं अपना कर एक ईमानदार और ईर्ष्यामुक्त समाज का निर्माण करें

Edited By Updated: 31 Jan, 2026 06:27 AM

let us build an honest society by following guruji s teachings

भारतीय संस्कृति में, जब हम भक्ति आंदोलन की बात करते हैं, तो सबसे पहले जिस आध्यात्मिक विचारक का नाम हमारे मन में आता है, वह है श्री गुरु रविदास जी का। ऐसा कहा जाता है कि जब भी संसार में अत्याचार, बुराई या दुराचार चरम पर पहुंचता है, तब स्वयं भगवान...

भारतीय संस्कृति में, जब हम भक्ति आंदोलन की बात करते हैं, तो सबसे पहले जिस आध्यात्मिक विचारक का नाम हमारे मन में आता है, वह है श्री गुरु रविदास जी का। ऐसा कहा जाता है कि जब भी संसार में अत्याचार, बुराई या दुराचार चरम पर पहुंचता है, तब स्वयं भगवान किसी न किसी रूप में मानव रूप धारण करके इस अंधकार में मानवता का मार्ग दिखाने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। 15वीं-16वीं शताब्दी की बात करें, जब समाज जातिवाद, गरीबों पर अत्याचार, भेदभाव और ऊंच-नीच जैसी बुराइयों से ग्रस्त था, तब मानवता को इन बुराइयों से मुक्त करने और समाज के ठेकेदारों को सही मार्ग दिखाने के लिए भगवान ने सांसारिक रूप धारण किया और एक ‘मर्द अगंबड़े’ को पृथ्वी पर भेजा, जो बाद में श्री गुरु रविदास जी के नाम से जाने गए। 

उनका जन्म सन 1376 ईस्वी, यानी 1433 विक्रमी सम्वत् को काशी बनारस (अब उत्तर प्रदेश) में पिता संतोख और माता कलसी जी के घर हुआ था। अपने जीवनकाल में उन्होंने बढ़ई का काम किया और मनुष्य को अपने हाथों से काम करने का संदेश दिया। उन्होंने अपनी कमाई का उपयोग संगत, पंगत और लंगर की सेवा में किया और मानवता को यह संदेश दिया कि हाथों से कोई भी काम करना मनुष्य के लिए गर्व की बात है। कोई भी काम बुरा नहीं होता, बल्कि मनुष्य की बुरी सोच ही उसे बुरा बना देती है। बेशक उस समय मजलूमों की आवाज उठाने के लिए धर्म के ठेकेदारों ने उनकी आवाज को दबाने के हरसंभव प्रयास किए और उनके साथ दुव्र्यवहार किया, फिर भी अपनी विनम्रता और एकजुटता की शिक्षाओं के कारण उन्होंने हर भटके व्यक्ति को सही राह दिखाई।

श्री गुरु रविदास जी द्वारा रचित बाणी की बात करें तो उनके 41 शबद/श्लोक श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में अंकित हैं। इसके अलावा, ‘रैदास जी की बाणी’ नामक हस्तलिखित ग्रंथ भी उपलब्ध है। 1984 में भाषा विभाग ने इसे ‘बाणी सतगुरु रविदास जी की’ शीर्षक से प्रकाशित किया था। भारत के लोगों के लिए यह गर्व की बात है कि इस भूमि पर अनेक गुरुओं, संतों, फकीरों और भक्तों ने जन्म लिया तथा मानवता के कल्याण के लिए अथक परिश्रम किया।

श्री गुरु रविदास जी के भजन प्रेम और भक्ति पर आधारित हैं व अच्छे लोगों की संगति में रहने की प्रेरणा देते हैं। ये भजन संदेश देते हैं कि व्यक्ति जिस प्रकार की संगति में रहता है, उसी प्रकार की सोच उसमें उत्पन्न हो जाती है। गुरु जी के भजन अच्छे लोगों की संगति में रहने का संदेश देते हैं, क्योंकि अच्छी संगति व्यक्ति के दोषों को दूर करती है और उसे लोहे से सोने में बदल देती है। ये भजन मानवता और आध्यात्मिक प्रेम का संदेश देते हैं। केवल अच्छी संगति ही अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा पूर्वाग्रह से निष्पक्षता की ओर ले जाती है। अच्छी संगति में रहने से व्यक्ति के मन की भटकन, मैल और अहंकार दूर हो जाते हैं तथा मन स्थिर हो जाता है। इसलिए, व्यक्ति को अच्छी संगति अपनानी चाहिए और उसमें रहना चाहिए।

उनकी बाणी मनुष्य को झूठे दिखावों, वहमों-भ्रमों/मंत्रों और तंत्रों से दूर रहने की चेतावनी देती है तथा एक ऐसे समाज की स्थापना का लक्ष्य रखती है, जहां मनुष्य को कोई पीड़ा, दुख और चिंता न हो, कोई कर न देना पड़े और प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हो। तभी वह अपनी बाणी में लिखते हैं कि ‘बेगम पुरा शहर को नाओ, दुख अंदोह नहीं तिही ठाओ।’ इसी प्रकार, गुरु जी के समकालीन श्री गुरु नानक देव जी ने भी अपनी बाणी में ‘एक पिता एकस के हम बारिक’ का संदेश दिया और श्री गुरु गोङ्क्षबद सिंह जी ने भी अकाल पुरख की महिमा में मानवता के कल्याण के लिए यह अंकित किया कि ‘मानस की जात सभै एकै पहिचानबो।’

ऐसी सब महत्वपूर्ण जानकारियों के बावजूद, अगर हम वर्तमान समय में जागरूकता की बात करें, तो हम गुरुपर्व तो मनाने में सक्षम हो गए हैं लेकिन गुरु जी की शिक्षाओं का पालन करने में अभी भी असमर्थ हैं। हम उस अंधकार को समझने में असमर्थ हैं, जिससे उनकी धार्मिक यात्राओं, दर्शन और बाणी ने हमें बाहर निकाला था। दुख की बात है कि बड़े-बड़े पोस्टरों, जयकारों और नारों की गूंज हमारे मन को ऊपर नहीं उठा सकी। हमारा मन अब भी भटक रहा है। हम प्रभातफेरियों, नगर कीर्तनों और शोभायात्राओं में आसानी से शामिल हो जाते हैं लेकिन सत्य की खोज करने और श्री गुरु रविदास जी द्वारा अपनी बाणी के माध्यम से दिखाए गए मार्ग पर चलने में अब भी असहज महसूस करते हैं। 

आइए इस गुरुपर्व पर यह प्रतिज्ञा करें कि हम इसे मेले की तरह नहीं मनाएंगे, बल्कि उनके सच्चे दर्शन को अपने जीवन में अपनाकर एक ईमानदार और ईष्र्यामुक्त समाज का निर्माण करेंगे। मुफ्त की वस्तुओं को अपनाने की बजाय, आइए हम स्वयं को और अपने बच्चों को यथासंभव शिक्षित करें तथा अपने हाथों से काम करके अपने परिवार, देश एवं समाज को नई ऊंचाइयों पर ले जाएं।-सरबजीत राय (पूर्व पुलिस कप्तान, जालंधर)

Related Story

    IPL
    Royal Challengers Bengaluru

    190/9

    20.0

    Punjab Kings

    184/7

    20.0

    Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

    RR 9.50
    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!