नोट के बदले वोट की राजनीति

Edited By Updated: 02 May, 2024 05:46 AM

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केन्द्रीय चुनाव आयोग नकदी जब्त करने का पिछला सारा रिकॉर्ड इस चुनाव में तोड़ देगा, जब्त की गई नकदी का आंकड़ा देख कर यही लगता है। आदर्श आचार संहिता लागू होने के कुछ समय बाद ही यह आंकड़ा 4,650 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। प्रतिदिन औसतन 100 करोड़ रुपए की...

केन्द्रीय चुनाव आयोग नकदी जब्त करने का पिछला सारा रिकॉर्ड इस चुनाव में तोड़ देगा, जब्त की गई नकदी का आंकड़ा देख कर यही लगता है। आदर्श आचार संहिता लागू होने के कुछ समय बाद ही यह आंकड़ा 4,650 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। प्रतिदिन औसतन 100 करोड़ रुपए की बरामदगी में प्राय: सभी दलों के प्रत्याशी शामिल रहे हैं। दूसरे चरण के चुनाव से ठीक पहले कर्नाटक में भाजपा के उम्मीदवार डा. के. सुधाकर से 4.8 करोड़ रुपए नकदी की बरामदगी हुई। पिछली बार 2019 के पूरे चुनाव में जब्त कुल नकदी 3475 करोड़ रुपए थी। यह पिछले चुनाव के दौरान एकत्र की गई कुल राशि से 34 फीसदी अधिक है। कोई दावे से नहीं कह सकता कि 7 चरणों का मतदान खत्म होने पर यह आंकड़ा कितना होगा। 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनावी बांड की वैधता पर फैसला देने के ठीक दो महीने बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी चर्चा करते हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा चुनावी बांड योजना को रद्द करने के बाद देश को पूरी तरह से काले धन की ओर धकेल दिया है और ईमानदारी से सोचेंगे तो हर किसी को इसका पछतावा होगा। हैरत की बात है कि इस मुद्दे पर सरकार और कोर्ट दोनों ही पारदॢशता की बात करते हैं। साथ ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पुन: संशोधित दूसरी स्कीम लाने की बात करती हैं। उच्चतम न्यायालय की मदद के बिना लेन-देन के इस मामले का ज्ञान देश की जनता के लिए संभव नहीं था। 18वीं लोकसभा के चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद ही नोट के बदले वोट का असली खेल शुरू होता है। इस खेल से लंबे समय से भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। 

साल 2008 में परमाणु समझौते के बाद वामपंथी दल ने यू.पी.ए. सरकार को बाहर से समर्थन देना बंद कर दिया था। नतीजतन अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने वाली मनमोहन सिंह सरकार पर नोट के बदले वोट का आरोप लगा था। लोकसभा में अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोड़ा जैसे तीन भाजपा सांसद नकदी के बंडल लहरा कर सत्ता पक्ष पर खरीद फरोख्त का आरोप लगाते हैं। बाद में साक्ष्य के अभाव के नाम पर इसे दबा दिया गया। यह एक अबूझ पहेली बन कर गई। राज्य विधानसभाओं में खरीद-फरोख्त बराबर होती है। इसी वजह से पांच सितारा होटलों में विधायकों को नजरबंद करने की परम्परा कायम हुई। 

विश्वास मत की आड़ में विकसित हुई इस व्यवस्था का अपना महत्व है। कांग्रेस नेता और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को जब राज्य की पुलिस द्वारा 2015 में गिरफ्तार किया गया था तो वह तेदेपा के सदस्य थे। नौ साल पहले उन्हें विधायक एल्विस स्टीफेंसन को वोट के लिए 50 लाख रुपए की रिश्वत देते हुए पकड़ा गया था। यह मामला आज भी कोर्ट में लंबित है। सत्ता के निचले पायदान पर स्थिति बहुत गंभीर है। लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले आम नागरिक क्या इस पर किसी से पीछे रहना चाहते हैं? बारामती में शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले और अजीत पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार के बीच जंग में निर्णय करने वाली जनता में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो खुल कर पैसा लेने की बात स्वीकार रहे हैं। 

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने खुले-आम दिल्लीवासियों से दूसरी पार्टी से पैसे लेकर आम आदमी पार्टी को वोट करने की अपील की। ऐसी दशा में यह नहीं कहा जा सकता है कि चुनावी बांड योजना के जारी रहने पर नकदी बांटने का खेल भी खत्म हो गया होता। आधुनिक भारत की राजनीति पर लालच का दुस्साध्य रोग हावी है। सरकार राजनीतिक चंदे को नकदी से बैंकिंग सिस्टम में लाने का काम ही पारदॢशता समझती है। यदि इसमें सच्चाई नहीं होती तो ई.डी. और सी.बी.आई. के छापों के बाद बॉन्ड खरीदने वाली कंपनियों के साथ भाजपा की सांठ-गांठ पर चर्चा नहीं चल रही होती। 

इस एक संकट के साथ भय और भ्रम का मायाजाल पसरा है। मतदान की गोपनीयता का कानून इसी पर आधारित है। सामाजिक और आॢथक गैर-बराबरी के कारण ऐसा ही होता रहेगा। फिरंगियों को पता था कि देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले वीरों का भारत नियम-कानून के बूते ही कमजोर किया जा सकता है। राजनीतिक अर्थशास्त्र का तिलिस्मी खेल आंखों के सामने हो कर भी ओझल प्रतीत होता है। इस परिस्थिति में आम जनता के सामने मनोरंजन के साधन बढ़ते रहेंगे और शासन व्यवस्था से जुड़ी बातें गोपनीयता का लबादा ओढ़ती बढ़ेंगी। देशप्रेम और लोक सेवा की भावना आजादी की लड़ाई के प्राण तत्व माने गए हैं। आजादी के बाद सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में क्या यह भाव कहीं है? राजनीति में धनबल व बाहुबल का शंखनाद होने लगा है। क्या अब पारदर्शिता की बात पर विधायिका और न्यायपालिका में सहमति कायम होगी? राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता की बात पर सुप्रीम कोर्ट भी मानती है कि कॉर्पोरेट योगदान पूरी तरह से व्यावसायिक लेन-देन है। यह बदले में लाभ हासिल करने के इरादे से ही किया जाता है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलटी (सी.एस.आर.) के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है।-कौशल किशोर 
 

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