Edited By jyoti choudhary,Updated: 08 Jan, 2026 02:35 PM

आगामी केंद्रीय बजट से पहले उद्योग निकाय एसोचैम ने सरकार से इस्पात क्षेत्र में हरित और टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाने की मांग की है। एसोचैम ने हाइड्रोजन आधारित ‘डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन’ (डीआरआई) तकनीक को अपनाने के लिए प्रोत्साहन...
बिजनेस डेस्कः आगामी केंद्रीय बजट से पहले उद्योग निकाय एसोचैम ने सरकार से इस्पात क्षेत्र में हरित और टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अहम कदम उठाने की मांग की है। एसोचैम ने हाइड्रोजन आधारित ‘डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन’ (डीआरआई) तकनीक को अपनाने के लिए प्रोत्साहन देने और इस बदलाव में इस्पात कंपनियों को रियायती दरों पर हरित वित्त उपलब्ध कराने का सुझाव दिया है।
डीआरआई तकनीक में पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस की जगह गैस या हाइड्रोजन की मदद से कम तापमान पर लौह अयस्क को लोहे में बदला जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन काफी हद तक कम होता है। उद्योग निकाय का मानना है कि इससे स्वच्छ उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।
एसोचैम ने बजट पूर्व सुझावों में इस्पात संयंत्रों में वेस्ट-हीट रिकवरी सिस्टम को प्रोत्साहित करने और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित निजी बिजली संयंत्र स्थापित करने की भी वकालत की है। इससे स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग में वृद्धि होगी और कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण संभव होगा।
इसके अलावा, उद्योग निकाय ने स्क्रैप संग्रह और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि इससे आयात पर निर्भरता घटेगी। इसके लिए घरेलू रीसाइक्लिंग अवसंरचना को मजबूत करने और कौशल विकास की आवश्यकता बताई गई है।
एसोचैम ने यह भी कहा कि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक होने के बावजूद भारत का इस्पात क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। कच्चे माल की ऊंची लागत, रुपए में गिरावट और आयातित कोकिंग कोयले पर निर्भरता बड़ी समस्याएं हैं।
उद्योग निकाय का मानना है कि आगामी बजट ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत को इस्पात और मूल्यवर्धित उत्पादों का वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का अहम अवसर प्रदान करता है। इसके लिए लौह अयस्क शोधन, आयात शुल्क में राहत और अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है।