Edited By jyoti choudhary,Updated: 23 Feb, 2026 06:26 PM

केंद्र सरकार कॉरपोरेट सैक्टर को बड़ी राहत देने की दिशा में अहम कदम उठाने जा रही है। सरकार टैक्स अकाउंटिंग और फाइनेंशियल अकाउंटिंग सिस्टम को आपस में मर्ज करने के मसौदे पर काम कर रही है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह 2016 के बाद अकाउंटिंग सिस्टम...
नई दिल्लीः केंद्र सरकार कॉरपोरेट सैक्टर को बड़ी राहत देने की दिशा में अहम कदम उठाने जा रही है। सरकार टैक्स अकाउंटिंग और फाइनेंशियल अकाउंटिंग सिस्टम को आपस में मर्ज करने के मसौदे पर काम कर रही है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह 2016 के बाद अकाउंटिंग सिस्टम में सबसे बड़ा सुधार माना जाएगा।
दोहरी गणना से मिलेगी छुटकारा
फिलहाल कंपनियों को शेयरधारकों के लिए इंडियन अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स (इंड.ए.एस.) और टैक्स के लिए इनकम कंप्यूटेशन एंड डिस्क्लोजर स्टैंडर्ड्स (आई.सी.डी.एस.) के तहत अलग-अलग हिसाब रखना पड़ता है। इस दोहरी व्यवस्था से न केवल कंपनियों पर बोझ बढ़ता है, बल्कि टैक्स विवाद भी पैदा होते हैं। सरकार का मकसद इस जटिल प्रक्रिया को खत्म करना है।
क्यों जरूरी समझा जा रहा है यह कदम
सरकारी सूत्रों के मुताबिक मौजूदा सिस्टम में टैक्स की गणना को लेकर अस्पष्टता बनी रहती है। एक ही लेन-देन को दो अलग नजरियों से देखने के कारण रिकंसिलिएशन, नोटिस और मुकदमेबाजी बढ़ जाती है। सरकार मानती है कि एकीकृत ढांचा लागू होने से टैक्स परिणाम ज्यादा साफ और भरोसेमंद होंगे।
इंड.ए.एस. और आई.सी.डी.एस. में फर्क
इंड.ए.एस. जहां संपत्तियों और देनदारियों का मूल्यांकन फेयर वैल्यू के आधार पर करता है, वहीं आई.सी.डी.एस. आमतौर पर ऐतिहासिक लागत पर जोर देता है। इसी वजह से कई मामलों में इंड.ए.एस. के तहत दिखाया गया लाभ टैक्स के दायरे में नहीं आता, जिससे टैक्स विवाद खड़े होते हैं।
विशेषज्ञ बोले विवाद घटेंगे, बढ़ेगा भरोसा
टैक्स और अकाउंटिंग विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों मानकों के विलय से टैक्स कंप्लायंस आसान होगा और सालाना गणनाओं में समय बचेगा। इससे अदालतों में लंबित टैक्स मामलों में भारी कमी आएगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे टैक्स सिस्टम ज्यादा पारदर्शी और अनुमान योग्य बनेगा। हालांकि जानकारों का यह भी कहना है कि इंड.ए.एस. अंतरराष्ट्रीय मानकों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अगर आई.सी.डी.एस. को ज्यादा तरजीह दी गई, तो भारतीय कंपनियों के वित्तीय नतीजों की वैश्विक तुलना प्रभावित हो सकती है। सरकार को दोनों के बीच संतुलन साधना होगा।
कॉरपोरेट इंडिया में बढ़ी हलचल
इस सुधार से कंपनियों को अलग-अलग हिसाब रखने से राहत, टैक्स विवादों में कमी, कंप्लायंस लागत घटने और रिपोर्टिंग में पारदर्शिता का फायदा मिलेगा। सरकारी संकेतों के बाद कॉरपोरेट जगत में हलचल तेज हो गई है। उद्योग जगत का मानना है कि यह फैसला इज ऑफ डूइंग बिजनेस को मजबूती देगा और निवेशकों का भरोसा बढ़ाएगा। अब सबकी नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी है।