HDFC Bank Controversy: बैंक में तगड़ा एक्शन, 12 अधिकारियों पर कार्रवाई, इंक्रीमेंट और स्टॉक ऑप्शन कैंसिल

Edited By Updated: 03 Apr, 2026 06:02 PM

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दुबई स्थित एचडीएफसी बैंक की शाखा में सामने आए अतिरिक्त टियर-1 (AT1) बॉन्ड मिस-सेलिंग मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। करीब पांच साल तक गड़बड़ियों को छिपाने के आरोपों के बीच बैंक ने सख्त कार्रवाई करते हुए 12 अधिकारियों पर शिकंजा कसा है, जिससे मामले...

बिजनेस डेस्कः दुबई स्थित एचडीएफसी बैंक की शाखा में सामने आए अतिरिक्त टियर-1 (AT1) बॉन्ड मिस-सेलिंग मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। करीब पांच साल तक गड़बड़ियों को छिपाने के आरोपों के बीच बैंक ने सख्त कार्रवाई करते हुए 12 अधिकारियों पर शिकंजा कसा है, जिससे मामले में जवाबदेही तय करने की कोशिश तेज हो गई है।

दुबई के वित्तीय नियामक दुबई फाइनेंशियल सर्विसेज अथॉरिटी (DFSA) ने बैंक की दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर शाखा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच में पाया गया कि बैंक ने ग्राहकों को जोखिमभरे क्रेडिट सुइस के AT1 बॉन्ड्स की गलत बिक्री के मामले में करीब पांच साल तक नियामक को जानकारी नहीं दी। 

DFSA के अनुसार, बैंक की कंप्लायंस और इंटरनल ऑडिट टीम को 2020 से ही इस गड़बड़ी की जानकारी थी लेकिन न तो इसे समय पर सुलझाया गया और न ही इसकी रिपोर्टिंग की गई। इन बॉन्ड्स को ग्राहकों, खासकर एनआरआई निवेशकों को “कैपिटल प्रोटेक्टेड” और सुरक्षित निवेश के रूप में पेश किया गया, जबकि बाद में ये लगभग बेकार हो गए।

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बैंक पर लगाई रोक

मामले की गंभीरता को देखते हुए DFSA ने सितंबर 2025 में HDFC बैंक की दुबई शाखा पर नए ग्राहक जोड़ने और नया कारोबार शुरू करने पर रोक लगा दी थी। नियामक ने इसे पारदर्शिता और ईमानदारी के मानकों में गंभीर चूक बताया। यह विवाद 2017-18 के दौरान शुरू हुआ, जब कई एनआरआई ग्राहकों ने आरोप लगाया कि उन्हें AT1 बॉन्ड्स को फिक्स्ड डिपॉजिट जैसा सुरक्षित बताकर बेचा गया और कुछ मामलों में उनसे खाली कागजों पर हस्ताक्षर भी कराए गए। जुलाई 2025 में नागपुर की आर्थिक अपराध शाखा में दर्ज शिकायत के बाद यह मामला व्यापक रूप से सामने आया, जिसके बाद Deloitte और Kroll जैसी एजेंसियों ने भी जांच की।

मई 2025 की आंतरिक रिपोर्ट में बैंक ने भी इस मामले में चूक स्वीकार की। रिपोर्ट में सामने आया कि 2017 से 2024 के बीच 61 रिलेशनशिप मैनेजर्स ने 1707 ऐसे ग्राहकों को सेवाएं दीं जो DIFC के आधिकारिक ग्राहक नहीं थे और इनसे जुड़े संचार का कोई ठोस रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं था।

कार्रवाई में सीनियर और मिड-लेवल के अधिकारी शामिल

इस बीच, बैंक ने जवाबदेही तय करते हुए सख्त कदम उठाए हैं। पहले तीन वरिष्ठ अधिकारियों को बर्खास्त किया गया और अब 12 अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है, जिनमें सीनियर और मिड-लेवल दोनों शामिल हैं। आशीष पार्थसारथी जैसे अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की गई है, जिसमें इंक्रीमेंट रोकना और कर्मचारियों को मिलने वाले शेयर (ESOPs) रद्द करना शामिल है। इससे यह संकेत मिलता है कि मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं था, बल्कि कई स्तरों पर फैला हुआ था।

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बैंक के चेयरमैन ने दिया इस्तीफा 

इस पूरे घटनाक्रम के बीच बैंक के चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने एथिकल कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है। हालांकि बैंक ने स्पष्ट किया है कि उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

कोर्ट नहीं, आंतरिक सुधार पर फोकस

बैंक ने इस मामले को अदालत में ले जाने के बजाय आंतरिक सुधार पर जोर दिया है और Trilegal तथा Wadia Ghandy & Co जैसी लॉ फर्म्स को गवर्नेंस और इंटरनल कंट्रोल्स की समीक्षा के लिए नियुक्त किया है।

पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि HDFC बैंक इस विवाद को डैमेज कंट्रोल के रूप में संभालने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह मामला बैंकिंग सेक्टर में पारदर्शिता, ग्राहक सुरक्षा और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनका समाधान आने वाले समय में बैंक के कदमों से ही तय होगा।
 

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