Gold Silver News: क्यों महंगे हो रहे सोना-चांदी? इकनॉमिक सर्वे में हुआ खुलासा

Edited By Updated: 29 Jan, 2026 03:19 PM

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आर्थिक सर्वे 2025-26 में कहा गया है कि सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में तेज उछाल वैश्विक वित्तीय और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बढ़ने का साफ संकेत है। सर्वे के मुताबिक, मौजूदा दौर में वैश्विक व्यापार अब बहुपक्षीय दक्षता (Multilateral...

बिजनेस डेस्कः आर्थिक सर्वे 2025-26 में कहा गया है कि सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में तेज उछाल वैश्विक वित्तीय और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बढ़ने का साफ संकेत है। सर्वे के मुताबिक, मौजूदा दौर में वैश्विक व्यापार अब बहुपक्षीय दक्षता (Multilateral Efficiency) के बजाय सुरक्षा और राजनीतिक चिंताओं से ज्यादा प्रभावित हो रहा है।

आखिर क्यों बढ़ीं सोना-चांदी की कीमतें?

सर्वे में बताया गया है कि वर्ष 2025 के दौरान अमेरिकी डॉलर के कमजोर होने, लंबे समय तक नकारात्मक वास्तविक ब्याज दरें बने रहने की उम्मीद और बढ़ते वैश्विक वित्तीय व जियोपॉलिटिकल जोखिमों के कारण सोने की कीमतों में जोरदार तेजी देखी गई।

आर्थिक समीक्षा के अनुसार, सोना और चांदी की कीमतों में आई यह तेजी इस बात का संकेत है कि वैश्विक अस्थिरता बढ़ रही है और निवेशक जोखिम भरे निवेश से निकलकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।

कोर महंगाई में शामिल नहीं होता सोना-चांदी

सर्वे में सोने को वैश्विक जोखिम भावना का अहम संकेतक बताया गया है। साथ ही साफ किया गया है कि कोर महंगाई की गणना में सोना और चांदी को शामिल नहीं किया जाता।

समीक्षा के मुताबिक, इन कीमती धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव घरेलू मांग और आपूर्ति से ज्यादा वैश्विक वित्तीय हालात से जुड़ा होता है। सोना-चांदी को हटाकर देखी गई कम कोर महंगाई इस बात का संकेत है कि देश की अर्थव्यवस्था में आपूर्ति पक्ष की स्थिति मजबूत हो रही है।

वैश्विक सिस्टम में बड़े बदलाव

आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि कीमती धातुओं की कीमतों में तेजी वैश्विक प्रणाली में हो रहे बड़े बदलावों से जुड़ी है। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, बढ़ते व्यापार विवाद, तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में अत्यधिक निवेश को लेकर बढ़ती चिंताओं ने वित्तीय बाजारों की अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

अब सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूम रहा वैश्विक व्यापार

सर्वे के अनुसार, अब वैश्विक व्यापार नीति मुख्य रूप से दक्षता या बहुपक्षीय नियमों पर आधारित नहीं रही है। इसके बजाय व्यापार राजनीतिक और सुरक्षा कारणों से संचालित हो रहा है। टैरिफ, प्रतिबंध और जवाबी कदमों का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार ज्यादा बंटा हुआ, कम अनुमानित और झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बन गया है।

भारत के लिए क्या मायने?

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि ऐसे माहौल में पूंजी प्रवाह, विनिमय दर और बाहरी संतुलन को लेकर जोखिम बढ़ जाते हैं, खासकर उन देशों के लिए जहां माल व्यापार घाटा लगातार बना रहता है। हालांकि, भारत के मजबूत सेवा निर्यात और विदेश से आने वाले धन (रेमिटेंस) कुछ हद तक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं लेकिन लंबे समय में व्यापार और मुद्रा स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत को मैन्युफैक्चरिंग आधारित निर्यात प्रणाली को और मजबूत करना होगा।

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