पेट्रोल-डीजल नहीं, यह संकट बढ़ा रहा दुनिया की टेंशन, बीच समुद्र में मालवाहक जहाजों के रुकने का खतरा!

Edited By Updated: 16 Mar, 2026 12:35 AM

not petrol or diesel this crisis is heightening global tensions

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो आम लोगों की चिंता आमतौर पर पेट्रोल और डीजल के महंगे होने तक सीमित रहती है। फिलहाल वैश्विक बाजार में Brent Crude Oil की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही है।

नेशनल डेस्कः अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो आम लोगों की चिंता आमतौर पर पेट्रोल और डीजल के महंगे होने तक सीमित रहती है। फिलहाल वैश्विक बाजार में Brent Crude Oil की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही है। ऊपर से देखने पर यह स्थिति बहुत ज्यादा डराने वाली नहीं लगती, लेकिन असली संकट तेल उद्योग के उस हिस्से में पैदा हो गया है जिसे आमतौर पर “फ्यूल ऑयल” कहा जाता है।

यह वह ईंधन है जो कच्चे तेल को रिफाइन करने के दौरान पेट्रोलियम डिस्टिलेशन टावर के सबसे निचले हिस्से से निकलता है। इसे अक्सर सबसे सस्ता और कम अहम उत्पाद माना जाता है। लेकिन ईरान युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में तनाव के कारण अब यही सस्ता ईंधन इतना महंगा और दुर्लभ हो गया है कि दुनिया के बड़े-बड़े मालवाहक जहाजों के रुकने का खतरा पैदा हो गया है। अगर ऐसा हुआ तो वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।

कच्चे तेल का ‘कचरा’ क्यों है इतना अहम

कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल जैसे महंगे उत्पाद निकालने के बाद जो भारी और गाढ़ा अवशेष बचता है, उसे फ्यूल ऑयल कहा जाता है। तेल उद्योग में इसे “बॉटम ऑफ द बैरल” यानी बैरल का सबसे निचला हिस्सा भी कहा जाता है। हालांकि नाम से यह कम अहम लगता है, लेकिन दुनिया के अधिकांश बड़े कंटेनर जहाज इसी ईंधन पर चलते हैं। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्ग से होता है और इन जहाजों की ईंधन जरूरतें फ्यूल ऑयल से ही पूरी होती हैं। दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनी A.P. Moller–Maersk के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Vincent Clerc ने फ्रांसीसी अखबार ले मोंडे को बताया कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो एशिया के प्रमुख बंदरगाहों पर जहाजों के लिए ईंधन खत्म होने का खतरा है।

एशिया के बड़े बंदरगाहों पर ईंधन की कमी

दुनिया के तीन सबसे बड़े बंकरिंग (जहाजों में ईंधन भरने वाले) केंद्रों में शामिल सिंगापु और फ़ुजैरा में फ्यूल ऑयल की भारी कमी देखी जा रही है। फुजैरा संयुक्त अरब अमीरात का प्रमुख तेल भंडारण और शिपिंग हब है। यूरोप और अमेरिका के कुछ बंदरगाहों पर अभी आपूर्ति बेहतर है, लेकिन दुनिया के शीर्ष दस बंकरिंग केंद्रों में से कई जगहों पर संकट गहराता जा रहा है।

टूट गया कच्चे तेल का पुराना गणित

तेल बाजार में आमतौर पर Brent Crude Oil और West Texas Intermediate जैसे मानकों के आधार पर कीमतों का आकलन किया जाता है। नीति-निर्माता और निवेशक अक्सर इन्हीं संकेतकों पर नजर रखते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि रिफाइनरियों को छोड़कर कोई भी सीधे कच्चा तेल नहीं खरीदता। आम तौर पर दुनिया रिफाइन किए गए उत्पाद ही खरीदती है। इसलिए असली असर रिफाइनिंग के बाद निकलने वाले उत्पादों की कीमतों से तय होता है। सामान्य परिस्थितियों में कच्चे तेल और उससे बनने वाले उत्पादों की कीमतें लगभग एक साथ बढ़ती-घटती हैं। लेकिन इस बार यह संतुलन टूट गया है। जहां ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, वहीं फ्यूल ऑयल की कीमतें उससे कहीं ज्यादा हो गई हैं।

सिंगापुर में फ्यूल ऑयल का भाव लगभग 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। वहीं Fujairah जैसे बड़े बंकरिंग केंद्र पर इसकी कीमत 160 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। पर्यावरण मानकों के अनुरूप कुछ विशेष किस्मों की कीमत तो 175 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची है, जो 2008 और 2022 के रिकॉर्ड स्तरों से भी ज्यादा है।

स्थिति यह है कि व्यापारी फोन पर कुछ मिनटों के लिए ही कीमत बताते हैं—अगर तुरंत सौदा तय नहीं किया गया तो कीमत बदल जाती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होना बड़ी वजह

इस संकट की सबसे बड़ी वजह Strait of Hormuz का बंद होना है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यह केवल कच्चे तेल के परिवहन के लिए ही नहीं बल्कि सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात की रिफाइनरियों से निकलने वाले फ्यूल ऑयल के निर्यात का भी प्रमुख रास्ता है। International Energy Agency के मुताबिक दुनिया में व्यापार होने वाले फ्यूल ऑयल का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इन खाड़ी देशों की रिफाइनरियों से आता है। तकनीकी रूप से भी खाड़ी क्षेत्र का कच्चा तेल ज्यादा फ्यूल ऑयल पैदा करता है। उदाहरण के लिए सऊदी अरब के “अरब लाइट” कच्चे तेल से रिफाइनिंग के बाद करीब 50 प्रतिशत तक अवशेष यानी फ्यूल ऑयल निकलता है। जबकि अमेरिका के West Texas Intermediate तेल से केवल लगभग 33 प्रतिशत अवशेष ही मिलता है। अब एशियाई रिफाइनरियों को अमेरिकी या रूसी तेल जैसे विकल्पों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिससे स्वाभाविक रूप से फ्यूल ऑयल का उत्पादन कम हो गया है।

महंगाई की नई लहर का खतरा

फिलहाल शिपिंग और तेल उद्योग इस संकट से निपटने के लिए अमेरिका और यूरोप से जहाजों के जरिए एशिया तक फ्यूल ऑयल पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका के Long Beach और Panama Canal के रास्ते तथा यूरोप के Rotterdam और Gibraltar जैसे बंदरगाहों से आपूर्ति भेजी जा रही है। दुनिया के कई देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार का भी इस्तेमाल शुरू कर दिया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इस तरह संकट को संभालना आसान नहीं होगा। अगर Strait of Hormuz ज्यादा समय तक बंद रहता है, तो यह खतरा बढ़ जाएगा कि कई कंटेनर जहाजों के पास अपनी यात्रा पूरी करने के लिए पर्याप्त ईंधन ही न बचे।

यानी रिफाइनरी टावर के सबसे निचले हिस्से से निकलने वाला यह “कचरा तेल” आज पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

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