Edited By Niyati Bhandari,Updated: 10 Oct, 2026 11:44 AM

1st day of Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि के प्रथम दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। जानिए मां शैलपुत्री का शांत स्वरूप, घटस्थापना विधि, मूलाधार चक्र जागरण का महत्व, शुभ रंग (लाल, पीला, नारंगी), सफेद भोग और पौराणिक...
1st day of Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि के पहले दिन माता शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा की जाती है। माता शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। माता शैलपुत्री स्थिरता और शक्ति का प्रतीक हैं। माता की पूजा करने से भक्तों के जीवन में भी स्थिरता आती है। माता का पूजन आपके मूलाधार चक्र को भी जागृत करता है और जीवन में अच्छे बदलाव आपको देखने को मिलते हैं।

ऐसा है मां शैलपुत्री का स्वरूप
माता शैलपुत्री का स्वरूप बेहत शांत और सरल है। माता के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल शोभा दे रहा है। मां अपने नंदी नामक बैल पर सवार होकर संपूर्ण हिमालय पर विराजमान हैं इसलिए माता शैलपुत्री को वृषोरूढ़ा और उमा के नाम से भी जाना जाता है। यह वृषभ वाहन शिवा का ही स्वरूप है और शैलपुत्री समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक भी हैं। माता शैलपुत्री ने घोर तपस्या करके ही भगवान शिव को प्रसन्न किया था। शैलपुत्री के अधीन वे समस्त भक्तगण आते हैं, जो योग, साधना-तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं। मां अपने भक्तों की हमेशा मनोकामना पूरी करती हैं और साधक का मूलाधार चक्र जागृत होने में सहायता मिलती है।

नवरात्रि के पहले दिन का रंग
नवरात्रि के पहले दिन नारंगी, लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन इन रंगों के वस्त्र धारण करने से मां शैलपुत्री का आशीर्वाद मिलता है।
मां शैलपुत्री भोग
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद चीजों जैसे बर्फी, खीर और रबड़ी का भोग लगाएं।

मां शैलपुत्री की पूजा विधि
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पहले विधि-विधान से घटस्थापना करें। कलश स्थापना के बाद माता के समक्ष घी का दीपक जलाएं और उन्हें फूल अर्पित करें। इस दिन माता को बर्फी, खीर और रबड़ी का भोग लगाएं। माता के मंत्रों का जाप करें। अंत में मां शैलपुत्री की आरती करें और प्रसाद सभी में बांट दें।
मां शैलपुत्री की कथा
देवी भागवत पुराण के अनुसार, एक बार प्रजापति दक्ष ने अपने यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया। जिसमें उन्होंने समस्त देवी-देवताओं को बुलाया, लेकिन भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को इसका निमंत्रण नहीं भेजा। भगवान शिव ने देवी सती को यज्ञ में जाने से मना किया, लेकिन माता नहीं मानीं और वे समारोह में चली गईं। देवी सती के पिता ने यज्ञ में सती और भगवान शिव का खूब अपमान किया। जिससे माता को बहुत दुख हुआ और उन्होंने यज्ञ की वेदी में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद देवी सती ने देवी पार्वती के रूप में जन्म लिया और तपस्या कर महादेव को पति के रूप प्राप्त किया।

मां शैलपुत्री के मंत्र
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
यूपी रत्न विभूषित, ज्योतिषाचार्य
महंत पं. सुधांशु तिवारी
मुख्य प्रवक्ता व टीवी पैनलिस्ट
संपर्क सूत्र - 9005804317, 7054594317
