Edited By Niyati Bhandari,Updated: 30 Oct, 2026 02:23 PM

Ahoi Ashtami Vrat Katha: वर्ष 2026 में 1 नवंबर को रखा जाएगा अहोई अष्टमी (अहोई आठें) का निर्जला व्रत। जानिए दतिया के सेठ चंद्रभान, बदरिका आश्रम के शीतल कुंड और राधा कुंड स्नान से जुड़ी अहोई माता की संपूर्ण पौराणिक कथा।
Ahoi Ashtami Vrat Katha: वर्ष 2026 में 1 नवंबर को रखा जाएगा अहोई अष्टमी (अहोई आठें) का निर्जला व्रत। जानिए दतिया के सेठ चंद्रभान, बदरिका आश्रम के शीतल कुंड और राधा कुंड स्नान से जुड़ी अहोई माता की संपूर्ण पौराणिक कथा।

कार्तिक मास को सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इसी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami 2026) का व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 1 नवंबर 2026 (रविवार) को रखा जाएगा। यह व्रत माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और रक्षा के लिए रखा जाता है।
लोक परंपरा में इसे अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है। अहोई शब्द का अर्थ है अनहोनी को होनी में बदल देने वाली शक्ति।
इस पावन अवसर पर माता पार्वती के स्वरूप अहोई माता की पूजा की जाती है। माताएं पूरा दिन निर्जला उपवास रखकर शाम को तारों (या चंद्रमा) को अर्घ्य देकर संतान के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करती हैं।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को मनाया जाने वाले इस पर्व पर माताओं द्वारा अपने बच्चों की रक्षा के लिए पूरा दिन व्रत रखा जाता है। शाम को दीवार पर छाप कर अहोई माता की पूजा करती हैं और कथा सुनती हैं। अहोई माता के स्वरुप में संसार संजोया दिखाया जाता है। रात को तारे को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। इस व्रत वाले दिन के संबंध में प्रचलित कथा निम्र है :

Ahoi ashtami vrat katha: पुराने समय की बात है दतिया नामक नगर में एक सेठ चंद्रभान रहता था। उसकी पत्नी का नाम चंद्रिका था जो बहुत गुणवती, सुंदर तथा चरित्रवान थी। उसके कई संतानें हुईं मगर सभी की छोटी आयु में ही मृत्यु हो जाती थी। संतानों के इस तरह मरते रहने के कारण पति-पत्नी बहुत दुखी थे तथा उन्हें चिंता थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका वंश कौन चलाएगा।
एक दिन दोनों ने सोचा कि हम सब कुछ त्याग कर जंगलों में निवास करें और यह सोच कर वे सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर चल पड़े। चलते-चलते पति-पत्नी बद्रिका आश्रम के पास शीतल कुंड के समीप पहुंचे और वहां जाकर प्राण त्यागने का मन बना लिया और अन्न-जल त्याग कर बैठ गए।
इसी तरह बैठे कई दिन बीत गए तो सातवें दिन आकाशवाणी हुई कि तुम अपने प्राण मत त्यागो। यह दुख तुम्हें पिछले जन्म के पाप कर्मों से मिला है। ऐ सेठ, अब तू अपनी पत्नी से आने वाले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को व्रत करवाना जिसके प्रभाव से अहोई देवी प्रकट होंगी।
तुम उनसे अपने पुत्रों की दीर्घ आयु मांगना। व्रत के दिन तुम राधा कुंड में स्नान करना। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि पर चंद्रिका ने बड़ी श्रद्धा से अहोई देवी का व्रत रखा और रात को सेठ ने राधा कुंड में स्नान किया। जब सेठ स्नान करके वापस आ रहा था तो रास्ते में अहोई देवी ने दर्शन दिए और बोली मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। तुम मुझ से कोई भी वर मांगो। अहोई देवी के दर्शन करके सेठ अति प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि मां मेरे बच्चे छोटी आयु में ही स्वर्ग सिधार जाते हैं इसलिए उनकी दीर्घायु का वर दें।
अहोई देवी ने कहा कि ऐसा ही होगा और अंतर्ध्यान हो गईं। कुछ समय पश्चात सेठ के यहां पुत्र पैदा हुआ और बड़ा होकर विद्वान, शक्तिशाली और प्रतापी हुआ।’’
इस महिमा के कारण ही अहोई माता के व्रत का प्रभाव बना। उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि थी इसलिए सभी माताएं इस दिन व्रत रखती हैं तथा विधि अनुसार पूजा आराधना करते हुए अपने बच्चों की दीर्घायु की कामना करती हैं।