Edited By Sarita Thapa,Updated: 07 Feb, 2026 12:51 PM

हकीम लुकमान बड़े विद्वान थे। बचपन में वह गुलाम थे। अपने मालिक की मर्जी के अनुसार ही चला करते थे। वह दिन-रात मालिक की सेवा में ही लगे रहते थे।
Best Motivational Story : हकीम लुकमान बड़े विद्वान थे। बचपन में वह गुलाम थे। अपने मालिक की मर्जी के अनुसार ही चला करते थे। वह दिन-रात मालिक की सेवा में ही लगे रहते थे। मालिक ने एक दिन लुकमान को जानबूझ कर एक कड़वी ककड़ी खाने को दी व कहा, "लो यह ककड़ी खाओ।"
मालिक ने सोचा था कि लुकमान इसे चखते ही फैंक देगा। मगर यह क्या? लुकमान वह पूरी कंकड़ी बिना कुछ कहे खा गए। उनके मुंह के हाव-भाव ने ऐसा भी न महसूस होने दिया कि ककड़ी उन्हें कड़वी लगी। मालिक ने पूछा, "वह ककड़ी तो कड़वी थी उसे तू पूरी ही खा कैसे गया?"
लुकमान ने कहा, "मालिक आप मुझे रोज ही खाने-पीने की कितनी चीजें देते हैं, उन्हीं के सहारे मेरा जीवन चल रहा है। आपने मुझे जब हमेशा इतनी सारी अच्छी वस्तुएं दीं व उन्हें मैंने स्वीकार कर अपना जीवन चलाया तो आज यदि कड़वी चीज आ गई तो उसे भी मैं स्वीकार क्यों न करता?"

लुकमान ने कहा, "मालिक मुझे तो तेरी बगिया में रहना है मुझे तो तेरे फूलों से भी उतना ही प्यार है जितना तेरे कांटों से।"
मालिक समझदार था, उसने बात समझी और वह विचार करने लगा "सच है उस मालिक ने हमें जन्म दिया, हमारा पालन किया व हमें इतने सुख में रखा तो यदि कभी-कभी हम विपत्तियों में पड़ जाएं व हमारे जीवन में प्रतिकूलताएं आएं तो उन्हें प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए।
मालिक ने लुकमान से कहा, "तुमने मुझे बड़ा सबक सिखाया है कि जो परमात्मा हमें तरह-तरह के सुख देता है, उसके हाथ से अगर कभी दुख भी मिले तो उसे खुशी से भोगना चाहिए।" मालिक ने लुकमान का बड़ा सम्मान किया व उसी दिन लुकमान को आजाद कर दिया।

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