Edited By Sarita Thapa,Updated: 30 Apr, 2026 12:59 PM
सनातन धर्म में छिन्नमस्ता जयंती का बहुत महत्व है। हर साल वैशाख माह की शुक्ल चतुर्दशी तिथि पर छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। इस बार छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, 2026 यानी आज के दिन मनाई जाएगी।
Chhinnamasta Jayanti 2026 : सनातन धर्म में छिन्नमस्ता जयंती का बहुत महत्व है। हर साल वैशाख माह की शुक्ल चतुर्दशी तिथि पर छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। इस बार छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, 2026 यानी आज के दिन मनाई जाएगी। छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में से एक हैं। मां छिन्नमस्ता को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से तांत्रिक साधना, मानसिक शक्ति और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। दस महाविद्याओं में शामिल यह देवी अपने अनोखे और विचित्र स्वरूप के कारण साधकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। इस दिन मां छिन्नमस्ता की पूजा करने और व्रत रखने के साथ उनके मंत्रों का जाप करना भी बहुत फलदायी माना जाता है। तो आइए जानते हैं मां छिन्नमस्ता के मंत्रों के बारे में-
छिन्नमस्ता अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र
श्रीपार्वत्युवाच
नाम्नां सहस्रमं परमं छिन्नमस्ता-प्रियं शुभम् ।
कथितं भवता शम्भो सद्यः शत्रुनिकृन्तनम् ॥१॥
पुनः पृच्छाम्यहं देव कृपां कुरु ममोपरि ।
सहस्रनामपाठे च अशक्तो यः पुमान् भवेत् ॥२॥
तेन किं पठ्यते नाथ तन्मे ब्रूहि कृपा-मय ।
श्री सदाशिव उवाच
अष्टोत्तरशतं नाम्नां पठ्यते तेन सर्वदा ॥३॥
सहस्र्-नाम-पाठस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम् ।
विनियोग : ॐ अस्य श्रीछिन्नमस्ताष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्रस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टुप् छन्दः श्रीछिन्नमस्ता देवता मम-सकल-सिद्धि-प्राप्तये जपे विनियोगः ॥
ॐ छिन्नमस्ता महाविद्या महाभीमा महोदरी ।
चण्डेश्वरी चण्डमाता चण्डमुण्ड्प्रभञ्जिनी ॥४॥
महाचण्डा चण्डरूपा चण्डिका चण्डखण्डिनी ।
क्रोधिनी क्रोधजननी क्रोधरूपा कुहू कला ॥५॥
कोपातुरा कोपयुता जोपसंहारकारिणी ।
वज्रवैरोचनी वज्रा वज्रकल्पा च डाकिनी ॥६॥
यहां पढ़ें छिन्नमस्ता सहस्रनाम स्तोत्र संस्कृत में
यहां पढ़ें छिन्नमस्ता सहस्रनाम स्तोत्र संस्कृत में
डाकिनी कर्म-निरता डाकिनी कर्मपूजिता ।
डाकिनी सङ्गनिरता डाकिनी प्रेम-पूरिता ॥७॥
खट्वाङ्ग-धारिणी खर्वा खड्गखप्परधारिणी ।
प्रेतासना प्रेतयुता प्रेतसङ्गविहारिणी ॥८॥
छिन्नमुण्डधरा छिन्नचण्डविद्या च चित्रिणी ।
घोररूपा घोरदृष्टर्घोररावा घनोवरी ॥९॥
योगिनी योगनिरता जपयज्ञपरायणा ।
योनिचक्रमयी योनिर्योनिचक्रप्रवर्तिनी ॥१०॥
योनिमुद्रा योनिगम्या योनियन्त्रनिवासिनी ।
यन्त्ररूपा यन्त्रमयी यन्त्रेशी यन्त्रपूजिता ॥११॥
कीर्त्या कर्पादनी काली कङ्काली कलकारिणी ।
आरक्ता रक्त-नयना रक्तपानपरायणा ॥१२॥
भवानी भूतिदा भूतिर्भूतिदात्री च भैरवी ।
भैरवाचारनिरता भूतभैरव सेविता ॥१३॥
भीमा भीमेश्वरी देवी भीमनाद परायणा ।
भवाराध्या भवनुता भव-सागरतारिणी ॥१४॥
भद्रकाली भद्रतनुर्भद्ररूपा च भद्रिका ।
भद्ररूपा महाभद्रा सुभद्रा भद्रपालिनी ॥१५॥
सुभव्या भव्यवदना सुमुखी सिद्धसेविता ।
सिद्धिदा सिद्धिनिवहा सिद्धासिद्धनिषेविता ॥१६॥
शुभदा शुभफ़्गा शुद्धा शुद्धसत्वा शुभावहा ।
श्रेष्ठा दृष्ठिमयी देवी दृष्ठिसंहारकारिणी ॥१७॥
शर्वाणी सर्वगा सर्वा सर्वमङ्गलकारिणी ।
शिवा शान्ता शान्तिरूपा मृडानी मदानतुरा ॥१८॥
इति ते कथितं देवि स्तोत्रं परमदुर्लभमं ।
गुह्याद्गुह्यतरं गोप्यं गोपनियं प्रयत्नतः ॥१९॥
यहां पढ़ें छिन्नमस्ता अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र संस्कृत में
यहां पढ़ें छिन्नमस्ता अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र संस्कृत में
किमत्र बहुनोक्तेन त्वदग्रं प्राण-वल्लभे ।
मारणं मोहनं देवि ह्युच्चाटनमतः परमम् ॥२०॥
स्तम्भनादिककर्माणि ऋद्धयः सिद्धयोऽपि च ।
त्रिकाल-पठनादस्य सर्वे सिध्यन्त्यसंशयः ॥२१॥
महोत्तमं स्तोत्रमिदं वरानने मयेरितं नित्य मनन्य-बुद्धयः ।
पठन्ति ये भक्ति-युता नरोत्तमा भवेन्न तेषां रिपुभिः पराजयः ॥२२॥
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