Dharmik Katha: परमेश्वरीय कृपा का प्रसाद है "जीवन"

Edited By Jyoti,Updated: 06 Aug, 2022 11:11 AM

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एक भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा था। अनेक मजदूरों को उसे बनाने के काम में रोजगार मिला हुआ था। एक दिन वहां से एक राहगीर गुजर रहा था। उसने सामने बैठे एक मजदूर से पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई?’’

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एक भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा था। अनेक मजदूरों को उसे बनाने के काम में रोजगार मिला हुआ था। एक दिन वहां से एक राहगीर गुजर रहा था। उसने सामने बैठे एक मजदूर से पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई?’’

उस मजदूर ने थोड़ी नाराजगी और झल्लाहट के साथ उसे जवाब दिया, ‘‘देखते नहीं, पत्थर तोड़ रहा हूं। हमारे भाग्य में तो लगता है कि यही सब करना लिखा है।’’
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राहगीर थोड़ी दूरी पर काम कर रहे दूसरे मजदूर के पास से गुजरा तो उसने उससे भी वही प्रश्र किया। 

निराशा से उसने सिर उठाकर उत्तर दिया, ‘‘घर-परिवार पालने के लिए मजदूरी कर रहा हूं।’’

थोड़ी दूर जाकर राहगीर ने एक और मजदूर से सवाल किया जो पत्थर फोड़ते हुए मस्ती में भजन गुनगुना रहा था। सवाल सुनकर मुस्कुराते हुए वह कहने लगा, ‘‘भगवान का एक बड़ा भव्य मंदिर बन रहा है। उसमें मुझे भी काम करने का भाग्य मिला है इसलिए भगवान का भजन गाते-गाते काम कर रहा हूं तो खूब आनंद आ रहा है।’’ 

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यह कह कर वह अपने काम में व्यस्त हो गया। इस प्रकार एक ही प्रकार का काम करने पर भी हमारे दृष्टिकोण के कारण भिन्न-भिन्न अनुभव हमें होते हैं। कुछ लोगों को जीवन बोझ लगता है। कैसे भी जीवन को घसीट कर जीते हैं। जब तक जीते हैं, दुख का अनुभव करते हैं और उसी दुख के साथ मर भी जाते हैं।

कुछ लोग दुखों को झेल लेते हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों में इतने डूबे रहते हैं कि उसके अलावा कुछ सूझता ही नहीं। जीवन का प्रत्येक क्षण भूतकाल में समा रहा है, इसकी तरफ न ध्यान रहता है, न भान। सुख-दुख के थपेड़े खाते रहते हैं।

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें लगता है कि जीवन तो परमेश्वरीय कृपा का प्रसाद है। वे किसी भी परिस्थिति में रहें, हमेशा आनंदित रहते हैं। सुख-दुख तो काल क्रम से आते ही रहते हैं, लेकिन उससे अलिप्त रहकर अपने कर्तव्य कर्म में वे खुद को व्यस्त रखते हैं।
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ऐसे में हमें ही यह निर्णय और प्रयत्न करना है कि हमें अपने जीवन में कैसा बनना है। हम अपने आप को बदल कर परिस्थिति भी अच्छी-बुरी बना सकते हैं।

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