Garud Puran: मृत्यु के बाद क्यों नहीं जलाते चूल्हा? जानें क्या कहता है गरुड़ पुराण

Edited By Updated: 09 Apr, 2026 10:12 AM

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Garud Puran: सनातन धर्म में जीवन के प्रत्येक चरण के लिए विशेष नियम और संस्कार निर्धारित किए गए हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम संस्कार का विशेष महत्व है। मृत्यु के बाद घर में कुछ परंपराओं का पालन करना...

Garud Puran: सनातन धर्म में जीवन के प्रत्येक चरण के लिए विशेष नियम और संस्कार निर्धारित किए गए हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अंतिम संस्कार का विशेष महत्व है। मृत्यु के बाद घर में कुछ परंपराओं का पालन करना अनिवार्य माना गया है, जिनमें से एक है चूल्हा न जलाना।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक, स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक कारण भी जुड़े हुए हैं। धार्मिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।

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गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है?
हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद किए जाने वाले नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि व्यक्ति के निधन के बाद कुछ समय तक घर में सामान्य गतिविधियों को सीमित रखना चाहिए, ताकि आत्मा की यात्रा शांतिपूर्ण हो और परिवार को शोक मनाने का अवसर मिल सके।

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आत्मा की शांति का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मृत्यु के बाद व्यक्ति की आत्मा कुछ समय तक अपने घर और परिवार के आसपास रहती है। ऐसे में यदि घर में सामान्य गतिविधियां, विशेषकर भोजन बनाना शुरू कर दिया जाए, तो इससे आत्मा को अशांति हो सकती है। इसलिए चूल्हा न जलाकर आत्मा की शांति के लिए समय दिया जाता है।

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स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़ा कारण
मृत्यु के बाद शरीर में कई प्रकार के जीवाणु उत्पन्न हो सकते हैं, जो वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए अंतिम संस्कार के बाद घर की पूरी सफाई, स्नान और वस्त्र धुलाई आवश्यक मानी जाती है। शुद्धिकरण से पहले भोजन बनाना स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं माना गया है।

सूतक काल का नियम और महत्व
मृत्यु के बाद 3 से 13 दिनों तक सूतक काल माना जाता है। इस दौरान घर में कई नियमों का पालन किया जाता है, जिनमें चूल्हा न जलाना प्रमुख है। यह समय आत्मिक शांति, शुद्धि और शोक व्यक्त करने के लिए निर्धारित किया गया है।

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मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू
शोकग्रस्त परिवार को इस समय मानसिक रूप से संभलने की आवश्यकता होती है। चूल्हा न जलाने की परंपरा उन्हें घरेलू कार्यों से विराम देती है, जिससे वे अपने दुख को समझ और स्वीकार कर सकें।

साथ ही, इस दौरान रिश्तेदार और पड़ोसी भोजन भेजकर सहयोग करते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और परिवार को भावनात्मक सहारा मिलता है।

मृत्यु के बाद चूल्हा न जलाने की परंपरा केवल धार्मिक नियम नहीं, बल्कि एक समग्र व्यवस्था है, जिसमें आत्मा की शांति, स्वच्छता, मानसिक संतुलन और सामाजिक सहयोग जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।

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