Edited By Niyati Bhandari,Updated: 24 Feb, 2026 12:33 PM

Holi celebration 2026: Holi 2026 इस वर्ष 4 मार्च को मनाई जाएगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व रंग, उमंग और भाईचारे का प्रतीक है। देशभर में होलिका दहन और रंगोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के...
Holi celebration 2026: Holi 2026 इस वर्ष 4 मार्च को मनाई जाएगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व रंग, उमंग और भाईचारे का प्रतीक है। देशभर में होलिका दहन और रंगोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन से लेकर राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र तक होली की धूम रहती है। विदेशों में भी भारतीय समुदाय इस त्योहार को हर्षोल्लास के साथ मनाता है।
हालांकि, आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि भारत में ही कुछ ऐसे गांव और स्थान हैं, जहां वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। इन स्थानों पर होली न मनाने के पीछे स्थानीय मान्यताएं, ऐतिहासिक घटनाएं और धार्मिक आस्थाएं जुड़ी हुई हैं।
आइए जानते हैं उन जगहों के बारे में, जहां होली के दिन रंगों की जगह सन्नाटा पसरा रहता है।
हरियाणा का दुसेरपुर: 300 साल पुरानी मान्यता
हरियाणा के दुसेरपुर गांव में पिछले लगभग 300 वर्षों से होली का त्योहार नहीं मनाया गया है।
क्या है मान्यता?
स्थानीय लोगों के अनुसार, कई साल पहले होली के दिन गांव के कुछ लोगों ने एक साधु की अवहेलना कर दी थी। इससे नाराज होकर साधु ने पूरे गांव को श्राप दिया कि यहां कभी होली नहीं मनाई जाएगी। ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि गांव में होली मनाई गई तो अनिष्ट हो सकता है। इसी भय और आस्था के चलते आज भी यहां न होलिका दहन होता है और न ही रंग खेला जाता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आज भी इसका पालन किया जाता है।

उत्तराखंड के खुरजान और क्विली गांव: कुल देवी का सम्मान
उत्तराखंड के खुरजान और क्विली गांवों में लगभग 150 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती।
धार्मिक आस्था से जुड़ा कारण
ग्रामीणों का मानना है कि उनकी कुल देवी त्रिपुर सुंदरी को शोर-शराबा पसंद नहीं है। चूंकि होली का त्योहार रंगों और उत्सव के साथ धूमधाम से मनाया जाता है, इसलिए यहां के लोग इसे नहीं मनाते। स्थानीय विश्वास है कि यदि गांव में होली खेली गई तो देवी रुष्ट हो सकती हैं और गांव पर संकट आ सकता है। यही कारण है कि इन दोनों गांवों में आज भी न तो होलिका दहन किया जाता है और न ही रंग खेला जाता है। लोग इस दिन सामान्य दिनचर्या का पालन करते हैं।

झारखंड का दुर्गापुर: ऐतिहासिक घटना से जुड़ी परंपरा
झारखंड के दुर्गापुर में भी होली नहीं मनाई जाती।
क्या है इतिहास?
स्थानीय कथा के अनुसार, होली के दिन ही दुर्गापुर के राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या रामगढ़ के राजा द्वारा कर दी गई थी। इस दुखद घटना के बाद गांव में शोक का माहौल रहा और तब से होली का त्योहार बंद कर दिया गया। कहा जाता है कि लगभग 100 वर्ष बाद कुछ खानाबदोश मल्हार समुदाय के लोगों ने यहां होली मनाने की कोशिश की थी। उसी दिन दो लोगों की मृत्यु हो गई और गांव में महामारी फैल गई। ग्रामीणों ने इसे होली मनाने से जोड़कर देखा। तब से गांव में सख्ती से होली नहीं मनाई जाती। यहां तक कि यदि गांव का कोई व्यक्ति बाहर होली के दिन मौजूद हो, तो लोग उस पर रंग लगाने से भी बचते हैं।

गुजरात का रामसन गांव: आग की घटना के बाद बंद हुआ उत्सव
गुजरात के रामसन गांव में करीब 200 वर्षों से होली नहीं मनाई गई है।
क्या हुआ था?
मान्यता है कि लगभग दो शताब्दी पहले होलिका दहन के दिन पूरे गांव में भीषण आग लग गई थी। आग इतनी फैल गई कि कई घर जलकर राख हो गए। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि वे अब होली का त्योहार नहीं मनाएंगे। तब से लेकर आज तक यहां होलिका दहन नहीं होता और रंगोत्सव भी नहीं मनाया जाता। ग्रामीणों के अनुसार, यह निर्णय गांव की सुरक्षा और शांति के लिए लिया गया था।
आस्था और परंपरा का सम्मान
भारत विविधताओं का देश है। जहां एक ओर मथुरा और वृंदावन में लट्ठमार होली विश्वप्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर कुछ गांवों में यह पर्व पूरी तरह से वर्जित है। इन स्थानों पर होली न मनाने की परंपरा चाहे ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी हो या धार्मिक आस्था से, लेकिन ग्रामीण आज भी इन मान्यताओं का सम्मान करते हैं। यह तथ्य भारतीय संस्कृति की विविधता और स्थानीय परंपराओं की गहराई को दर्शाता है।
Holi 2026 जहां देशभर में रंग, उमंग और उत्साह के साथ मनाई जाएगी, वहीं भारत के कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां यह दिन सामान्य दिनों की तरह ही बीतता है। इन स्थानों की मान्यताएं भले ही अजब-गजब लगें, लेकिन वहां के लोगों के लिए यह आस्था और परंपरा का सवाल है। भारत की यही विविधता उसे खास बनाती है, जहां हर क्षेत्र की अपनी अलग पहचान और विश्वास हैं।
