Edited By Sarita Thapa,Updated: 23 Feb, 2026 11:34 AM

संगम की धरती प्रयागराज इस बार सनातन परंपरा और आधुनिक पर्यावरण बोध के अद्भुत मिलन का केंद्र बनने जा रही है। शहर में इस वर्ष होलिका दहन के दौरान पेड़ों की लकड़ियों के उपयोग को कम करने के लिए प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने एक लाख गोबर के उपलों...
Eco Friendly Holi 2026 Prayagraj : संगम की धरती प्रयागराज इस बार सनातन परंपरा और आधुनिक पर्यावरण बोध के अद्भुत मिलन का केंद्र बनने जा रही है। शहर में इस वर्ष होलिका दहन के दौरान पेड़ों की लकड़ियों के उपयोग को कम करने के लिए प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने एक लाख गोबर के उपलों का विशाल भंडार तैयार किया है।
क्यों खास है यह वैदिक होली ?
पेड़ों को मिलेगी लंबी उम्र: आमतौर पर होलिका दहन के लिए भारी मात्रा में पेड़ों की टहनियों और लकड़ियों का इस्तेमाल होता है। इस बार एक लाख उपलों के उपयोग से सैकड़ों पेड़ों को कटने से बचाया जा सकेगा।
शुद्ध होगा वातावरण: शास्त्रों के अनुसार, गोबर के उपलों के दहन से निकलने वाला धुआं वायुमंडल को शुद्ध करने और हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करता है। इसे 'वैदिक होलिका' का नाम दिया गया है जो प्रदूषण फैलाने के बजाय वातावरण को पवित्र करेगी।
गो-सेवा को बढ़ावा: इन उपलों का निर्माण स्थानीय गौशालाओं में किया गया है। इससे होने वाली आय का उपयोग गायों के संरक्षण और चारे की व्यवस्था के लिए किया जाएगा, जिससे आत्मनिर्भर गौशालाओं का सपना भी साकार होगा।
एक लाख उपले बनकर तैयार
प्रयागराज के विभिन्न केंद्रों पर एक लाख से अधिक उपले और 'गो-काष्ठ' (लकड़ी के आकार में ढले उपले) तैयार कर लिए गए हैं। शहर के प्रमुख चौराहों और कॉलोनियों की आयोजन समितियों से अपील की गई है कि वे अपनी होलिका में लकड़ियों की जगह इन उपलों का प्रयोग करें।
सनातन और विज्ञान का संगम
आयोजकों का कहना है कि यह पहल केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन वैदिक पद्धति की ओर लौटने का एक प्रयास है। कपूर, जटामांसी और अन्य जड़ी-बूटियों के साथ जब ये उपले जलेंगे, तो यह एक बड़े 'हवन' की तरह काम करेंगे, जो मौसमी बीमारियों से लड़ने में भी सहायक होगा।