Magh Mela 2026 : प्रयागराज ही क्यों है माघ मेले का केंद्र? जानें तीर्थराज की महिमा और इसके पौराणिक रहस्य

Edited By Updated: 02 Jan, 2026 02:09 PM

magh mela 2026

भारत में आस्था और अध्यात्म की बात हो और प्रयागराज का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। हर वर्ष माघ मास में जब त्रिवेणी संगम तट पर माघ मेला सजता है, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था एक ही दिशा में उमड़ पड़ती है।

Magh Mela 2026 : भारत में आस्था और अध्यात्म की बात हो और प्रयागराज का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। हर वर्ष माघ मास में जब त्रिवेणी संगम तट पर माघ मेला सजता है, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था एक ही दिशा में उमड़ पड़ती है। कुंभ मेला जहां 12 वर्षों में एक बार लगता है, वहीं माघ मेला हर साल केवल प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। इसे दुनिया के सबसे प्राचीन और विशाल वार्षिक आध्यात्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आस्था का यह सबसे बड़ा दरबार केवल प्रयागराज में ही क्यों लगता है? आखिर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम को इतना पवित्र क्यों माना गया और इसके पीछे कौन-से पौराणिक रहस्य छिपे हैं? तो आइए जानते हैं कि तीर्थराज की महिमा और इसके पौराणिक रहस्य के बारे में-

Magh Mela 2026

प्रयागराज ही क्यों ?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रयागराज वे पावन धरती है जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम होता है और सनातन काल से ही तीर्थराज कहलाती है यानी तीर्थों का राजा। धार्मिक ग्रंथों की मान्यता के अनुसार, जब सृष्टि की रचना की प्रक्रिया आरंभ होने वाली थी, तब ब्रह्मा जी ने इसी स्थान पर एक महान अश्वमेध यज्ञ संपन्न किया। कहा जाता है कि यह यज्ञ सृष्टि का पहला यज्ञ था। इसी कारण इस पावन भूमि को प्रयाग कहा गया, जहां ‘प्र’ का अर्थ है प्रथम और ‘याग’ का अर्थ है यज्ञ। लेकिन इस स्थान पर माघ मेला लगने की सबसे बड़ी वजह अमृत की बूंदे मानी जाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ और अमृत कलश प्रकट हुआ को उसे उसे पाने के लिए असुरों और देवताओं में छीना-झपटी हुई, तब अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी थीं जो आज के समय  में हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज के नाम से जाने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि माघ के मास में प्रयागराज का जल स्वयं अमृत तुल्य हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मेला में संगम स्नान करने से व्यक्ति को अमृत गुणों की प्राप्ति होती है। लगभग 45 दिनों तक चलने वाले इस मेले में साधु-संत, कल्पवासी और श्रद्धालु तप, दान, सेवा और साधना के माध्यम से अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करते हैं।

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माघ मेले का धार्मिक महत्व
माघ मेले के धार्मिक महत्व की तो  मान्यताओं के अनुसार, माघ महीने में गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सांसारिक बंधन शिथिल होते हैं और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। संगम में किया गया स्नान मोक्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण साधना मानी गई है। इस माह दान, जप, तप और यज्ञ जैसे पुण्य कर्मों का प्रभाव सामान्य समय की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है। कहा जाता है कि माघ काल में किया गया प्रत्येक धार्मिक कार्य स्थायी पुण्य देता है, इसलिए भक्तजन इस अवसर को अत्यंत दुर्लभ और भाग्यशाली मानते हैं।

कल्पवास की प्राचीन परंपरा
माघ मेले का सबसे विशेष पहलू है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है- एक निश्चित समय के लिए सांसारिक मोह-माया छोड़कर पवित्र नदी के तट पर रहना और ईश्वर का ध्यान करना। इस दौरान श्रद्धालु संगम के तट पर रेत में तंबू बनाकर पूरे माघ माह तक निवास करते हैं। दिन में केवल एक समय भोजन ग्रहण करते हैं और प्रतिदिन तीन बार गंगा स्नान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ महीने में संगम के किनारे रहकर किया गया जप, तप और साधना व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने वाला माना जाता है।

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