Mahakal Temple Ujjain : 7 अनाज से होता है महाकाल का विशेष श्रृंगार, महाशिवरात्रि के बाद क्यों है यह रस्म खास ?

Edited By Updated: 15 Feb, 2026 10:25 AM

mahakal temple ujjain

Mahakal Temple Ujjain : शिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक उत्सव है, जिसकी आस्था पूरे देश में दिखाई देती है। इस पावन रात्रि में श्रद्धालु अपने आराध्य भगवान के दर्शन के लिए मंदिरों की ओर उमड़ पड़ते हैं।...

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Mahakal Temple Ujjain : शिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक उत्सव है, जिसकी आस्था पूरे देश में दिखाई देती है। इस पावन रात्रि में श्रद्धालु अपने आराध्य भगवान के दर्शन के लिए मंदिरों की ओर उमड़ पड़ते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर की बात ही कुछ और है। यहां महाशिवरात्रि का उत्सव विशेष भव्यता और आध्यात्मिक आभा के साथ मनाया जाता है।

महाकाल मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती से लेकर शयन आरती तक बाबा महाकाल का छह बार श्रृंगार किया जाता है, लेकिन महाशिवरात्रि के अगले दिन का नजारा अद्वितीय होता है। इस दिन विरक्त और औघड़ रूप में पूजे जाने वाले भगवान शिव एक आकर्षक दूल्हे के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। सिर पर सजा सेहरा और मुखमंडल पर दिव्य तेज यह स्वरूप श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देता है।

दूल्हे के रूप में बाबा महाकाल
महाशिवरात्रि के दूसरे दिन तड़के भगवान को दूल्हे की तरह सजाया जाता है। इस विशेष श्रृंगार को ‘सेहरा दर्शन’ कहा जाता है। भगवान को भव्य पुष्प मुकुट पहनाया जाता है, जिसे सेहरा कहा जाता है। यह केवल फूलों से नहीं, बल्कि ‘सप्तधान्य’ से भी सजाया जाता है। साथ ही सुंदर मुखौटा भी धारण कराया जाता है, जो शिव-पार्वती विवाह की आनंदमयी स्मृति को दर्शाता है।

सप्तधान्य की अनोखी परंपरा
इस श्रृंगार की सबसे विशेष बात सात प्रकार के अनाजों का प्रयोग है, जिसे सप्तधान्य कहा जाता है। इसमें चावल, खड़ा मूंग, तिल, मसूर, गेहूं, जौ और खड़ा उड़द शामिल होते हैं। इन धानों को प्रकृति की समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यह अनूठा श्रृंगार साल में केवल एक बार ही किया जाता है, इसलिए इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।

सेहरा आरती और प्रसाद का महत्व
श्रृंगार के पश्चात जो आरती होती है, उसे ‘सेहरा आरती’ कहा जाता है। जब सेहरा उतारा जाता है, तो उसमें प्रयुक्त सप्तधान्य को विशेष प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मान्यता है कि यह प्रसाद अत्यंत शुभ और फलदायी होता है। इसका एक हिस्सा राजकोष में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि राज्य में समृद्धि बनी रहे।

शेष अनाज श्रद्धालुओं को दिया जाता है। भक्तों का विश्वास है कि यदि इस प्रसाद को घर की तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखा जाए, तो घर में कभी भी आर्थिक तंगी नहीं आती और सुख-शांति व समृद्धि का वास बना रहता है।

इस प्रकार, महाशिवरात्रि के बाद होने वाला बाबा महाकाल का सेहरा श्रृंगार केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और समृद्धि का अद्भुत संगम है, जो उज्जैन की धार्मिक पहचान को और भी विशिष्ट बनाता है।
 

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