Edited By Niyati Bhandari,Updated: 06 Feb, 2026 05:57 PM

Premanand Maharaj Pravachan: आज की तेज़ रफ्तार और भौतिक सुख-सुविधाओं से भरी जिंदगी में इंसान अक्सर यह महसूस करता है कि वह मोह-माया के जाल में फंसता जा रहा है। खासकर वे लोग जो आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके मन में यह प्रश्न बार-बार...
Premanand Maharaj Pravachan: आज की तेज़ रफ्तार और भौतिक सुख-सुविधाओं से भरी जिंदगी में इंसान अक्सर यह महसूस करता है कि वह मोह-माया के जाल में फंसता जा रहा है। खासकर वे लोग जो आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके मन में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या परिवार, पत्नी और गृहस्थ जीवन भक्ति में बाधा बनते हैं? इसी विषय पर हाल ही में एक सत्संग के दौरान प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने ऐसे विचार रखे, जो हर गृहस्थ व्यक्ति की सोच को नई दिशा दे सकते हैं।
सत्संग में भक्त की दुविधा: “दो-दो माया ने घेर रखा है”
सत्संग के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज के सामने अपनी अनोखी समस्या रखी। भक्त ने कहा, “महाराज जी, एक तरफ भगवान की माया है और दूसरी तरफ मेरी पत्नी, जिनका नाम भी ‘माया’ है। क्या ये दोनों मेरे लिए आध्यात्मिक मार्ग में बाधा हैं?”
भक्त ने यह भी पूछा कि क्या माया तब तक नुकसानदेह नहीं होती, जब तक व्यक्ति अपनी वासनाओं पर नियंत्रण रखे?
इस प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज का उत्तर न केवल गूढ़ था, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक भी।
प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट संदेश: समस्या बाहर नहीं, भीतर है
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि असल समस्या न तो पत्नी है और न ही संसार, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद वासना, इच्छाएं और असंयम हैं। यदि व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण कर ले, तो माया कभी बाधा नहीं बनती। सही आचरण और मर्यादा में रहकर किया गया गृहस्थ जीवन भी भक्ति का मार्ग बन सकता है।
अहंकार नहीं, नम्रता से कटती है माया
महाराज ने यह भी स्पष्ट किया कि माया भगवान की ही दैवी शक्ति है। कोई भी व्यक्ति अपने अहंकार या बुद्धि के बल पर माया को नहीं जीत सकता। माया से पार पाने का एकमात्र उपाय है नम्रता, समर्पण और भगवान पर पूर्ण विश्वास। जो व्यक्ति अपने भीतर दीनता और कोमलता विकसित कर लेता है, वह संसार सागर को सहजता से पार कर लेता है।
“पत्नी माया नहीं, अर्धांगिनी और प्राण है”
भक्त के प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज ने विशेष रूप से कहा कि पत्नी को माया या बाधा समझना सबसे बड़ी भूल है। उन्होंने कहा,
“अर्धांगिनी आपके प्राणों के समान होती है। जैसे आप अपने शरीर की रक्षा करते हैं, वैसे ही पत्नी का सम्मान और पोषण करना आपका धर्म है।”
यदि आचरण शुद्ध हो, तो वही पत्नी लोक और परलोक—दोनों की यात्रा में सबसे बड़ी सहयोगी बन जाती है।
सही आचरण से माया भी बनती है आनंद का साधन
प्रेमानंद महाराज ने माया की तुलना मां से करते हुए कहा कि माया स्वयं दुख का कारण नहीं है। दुख का कारण हमारे गलत विचार, गलत कर्म और पापपूर्ण आचरण हैं। जब व्यक्ति भगवान के नाम का आश्रय लेता है और अपने विचार शुद्ध करता है, तो वही माया जीवन में आनंद और शांति का स्रोत बन जाती है।