Edited By Sarita Thapa,Updated: 06 Feb, 2026 01:34 PM

आज के दौर में जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह अक्सर आकर्षण और स्वार्थ तक ही सिमट कर रह गया है। लेकिन पूज्य प्रेमानंद जी महाराज ने लैला-मजनू की उस प्रसिद्ध गाथा को एक बिल्कुल नए और आध्यात्मिक नजरिए से परिभाषित किया है। समाज जिसे केवल एक प्रेमी और प्रेमिका...
Premanand Maharaj Teachings : आज के दौर में जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह अक्सर आकर्षण और स्वार्थ तक ही सिमट कर रह गया है। लेकिन पूज्य प्रेमानंद जी महाराज ने लैला-मजनू की उस प्रसिद्ध गाथा को एक बिल्कुल नए और आध्यात्मिक नजरिए से परिभाषित किया है। समाज जिसे केवल एक प्रेमी और प्रेमिका की कहानी मानता है, महाराज जी उसे इश्क-ए-हकीकी यानी परमात्मा से मिलने वाली रूहानी मोहब्बत का एक जीवंत उदाहरण बताते हैं। महाराज जी कहते हैं कि मजनू का प्रेम शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से था। जब व्यक्ति की इंद्रियां अपने प्रिय के ध्यान में इतनी लीन हो जाएं कि उसे अपनी देह तक की सुध न रहे, तब वह प्रेम दिखावा नहीं बल्कि इबादत बन जाता है। प्रेमानंद जी की सुनाई इस कथा के माध्यम से महाराज जी हमें यह समझाते हैं कि असली प्रेम वह है जिसमें अहंकार मिट जाए और केवल प्रियतम ही शेष रहे। यदि आपके मन में भी यह सवाल उठता है कि क्या आज के समय में सच्चा प्रेम संभव है, या फिर हम केवल दिखावे की दुनिया में जी रहे हैं, तो प्रेमानंद महाराज द्वारा खोला गया यह आध्यात्मिक रहस्य आपकी सोच को पूरी तरह बदल सकता है।
सच्चे मजनू की परीक्षा
महाराज जी बताते हैं कि जब लैला और मजनू का प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर था, तब समाज में कई लोग मजनू होने का दिखावा करने लगे थे। हर कोई खुद को लैला का सबसे बड़ा प्रेमी बताने का दावा करता था। ऐसे में लैला ने असली और नकली प्रेमी की पहचान करने के लिए एक परीक्षा ली। लैला ने एक दासी के माध्यम से यह घोषणा करवाई कि वह बीमार है और उसे इलाज के लिए सच्चे प्रेमी के रक्त की आवश्यकता है।

उसने कहा, जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है, वह अपना रक्त देकर मुझे जीवनदान दे। जैसे ही यह खबर फैली, जो लोग मजनू होने का ढोंग कर रहे थे, वे एक-एक करके पीछे हटने लगे। किसी ने बीमारी का बहाना बनाया तो कोई डर के मारे गायब हो गया। अंत में केवल एक ही व्यक्ति वहां डटा रहा- वह था असली मजनू। जब मजनू के पास दासी पहुंची, तो उसने बिना एक पल सोचे अपना हाथ आगे कर दिया। उसने कहा, मेरा शरीर, मेरी सांसें और मेरा रक्त सब लैला का ही है। अगर यह उसके काम आ सके, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए क्या होगा। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि मजनू ने केवल रक्त ही नहीं दिया, बल्कि वह अपनी जान तक देने को तैयार था। यहीं लैला को समझ आ गया कि बाकी सब दुनियादारी का दिखावा कर रहे थे, लेकिन मजनू का प्रेम आत्मिक और निस्वार्थ था।
प्रेमानंद महाराज जी का संदेश: प्रेम और भक्ति का मर्म
इस कहानी के माध्यम से प्रेमानंद जी यह समझाना चाहते हैं कि सच्चा प्रेम शब्दों में नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण में झलकता है। जैसे लैला ने मजनू को पहचाना, वैसे ही भगवान भी अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं। जो दुख और कठिन समय में भी अडिग रहता है, वही सच्चा भक्त है। जहां स्वार्थ शुरू होता है, वहां प्रेम समाप्त हो जाता है। प्रेमानंद महाराज जी के शब्दों में: प्रेम वह नहीं जो कुछ पाने की इच्छा रखे, प्रेम वह है जो अपना सब कुछ लुटाकर भी प्रसन्न रहे।

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