Edited By Prachi Sharma,Updated: 01 Apr, 2026 01:34 PM
Siddhivinayak Temple : महाराष्ट्र के सिद्धटेक नामक गांव में स्थित है सिद्धिविनायक। भीम नदी के किनारे स्थित एक छोटा-सा गांव। भगवान गणेश के ‘अष्टविनायक’ पीठों में से एक ‘सिद्धिविनायक’ को परम शक्तिमान माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां सिद्धटेक पर्वत...
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
Siddhivinayak Temple : महाराष्ट्र के सिद्धटेक नामक गांव में स्थित है सिद्धिविनायक। भीम नदी के किनारे स्थित एक छोटा-सा गांव। भगवान गणेश के ‘अष्टविनायक’ पीठों में से एक ‘सिद्धिविनायक’ को परम शक्तिमान माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां सिद्धटेक पर्वत था, जहां पर भगवान विष्णु ने तप द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी।
एक कथानुसार यह माना जाता है कि जब सृष्टि की रचना करते समय भगवान विष्णु को नींद आ गई, तब भगवान विष्णु के कानों से दो दैत्य मधु व कैटभ बाहर आए। बाहर आने के बाद वे दोनों उत्पात मचाने लगे।
सभी देवताओं को भी वे परेशान करने लगे। दैत्यों के आतंक से मुक्ति पाने हेतु देवताओं ने श्री विष्णु की आराधना की। तब विष्णु जी शयन से जागे और दैत्यों को मारने की कोशिश की परंतु भगवान अपने इस कार्य में असफल रहे।

तब विष्णु जी ने शिव जी की आराधना की। विष्णु जी की पुकार सुनकर भगवान शिव जी प्रकट हुए। उन्होंने बताया कि जब तक गणेश का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता, यह कार्य पूर्ण नहीं हो पाएगा।
तब भगवान विष्णु ने भगवान श्री गणेश का आह्वान किया, जिससे गणेश जी प्रसन्न हुए और दैत्यों का संहार हुआ। इस कार्य के उपरांत भगवान विष्णु ने पर्वत के शिखर पर मंदिर का निर्माण किया तथा भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की और ब्रह्माजी ने बाधारहित होकर सृष्टि की रचना की। तभी से यह स्थल ‘सिद्धटेक’ नाम से जाना जाता है।
इसके अतिरिक्त इसी स्थान पर ऋषि व्यास ने भी तपस्या की थी। यह अष्टविनायक के 8 प्रमुख मंदिरों में से एक है। सिद्धटेक के गणपति की मूर्ति लगभग 3 फुट ऊंची है और अन्य गणपतियों के विपरीत इसकी सूंड दाहिनी ओर मुड़ी हुई है। चेहरा शांत और कोमल है। सिद्धटेक मंदिर भीमा नदी के किनारे स्थित है। मंदिर लगभग 15 फुट ऊंचा है और अहिल्याबाई होलकर द्वारा बनवाया हुआ है।
मुम्बई के सिद्धिविनायक
वैसे तो सिद्धिविनायक के भक्त दुनिया के हर कोने में हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ये सबसे अधिक हैं। मुंबई के प्रभादेवी स्थित सिद्धिविनायक मंदिर उन गणेश मंदिरों में से एक है, जहां केवल हिन्दू ही नहीं, बल्कि हर धर्म के लोग दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इस मंदिर की न तो महाराष्ट्र के ‘अष्टविनायकों’ में गिनती होती है और न ही सिद्धटेक से इसका कोई संबंध है, फिर भी यहां गणपति पूजा का खास महत्व है। इसे जागृत स्थल माना जाता है।

महाराष्ट्र में गणपति के 8 सिद्ध ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल हैं, जो अष्टविनायक के नाम से प्रसिद्ध हैं लेकिन अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी इसकी महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं है। सिद्धिविनायक की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह चतुर्भुजी विग्रह है। उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक से भरा हुआ कटोरा है।
गणपति के दोनों ओर उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि-सिद्धि मौजूद हैं, जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक हैं। मस्तक पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है। सिद्धिविनायक का विग्रह अढ़ाई फुट ऊंचा है और यह 2 फुट चौड़े एक काले शिलाखंड से बना है। किंवदंती है कि इस मंदिर का निर्माण सम्वत् 1692 में हुआ था।
किंतु सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर का शुरुआती निर्माण 19 नवम्बर, 1801 में हुआ था। सिद्धिविनायक का तब का मंदिर बहुत छोटा था। पिछले दो दशकों में इस मंदिर का कई बार पुनॢनर्माण हो चुका है।
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने इस मंदिर को सुरक्षा के लिहाज से 20 हजार वर्गफुट जमीन प्रदान की थी। वर्तमान में सिद्धिविनायक मंदिर की इमारत पांच मंजिला है और यहां प्रवचनगृह, गणेश संग्रहालय व गणेश विद्यापीठ के अलावा दूसरी मंजिल पर अस्पताल भी है, जहां रोगियों की मुफ्त चिकित्सा की जाती है। इसी मंजिल पर रसोई घर भी है।
