Edited By Niyati Bhandari,Updated: 15 Jun, 2026 09:26 AM

Gunanidhi Story: जानें, कैसे एक साधारण चोर गुणनिधि बना देवताओं का धनपति कुबेर। स्कंद पुराण की इस रोचक कथा में छुपा है कुबेर देव और महादेव की कृपा का रहस्य।
Kuber Dev ki Katha: हिंदू धर्म में भगवान कुबेर को धन और ऐश्वर्य का अधिपति माना जाता है। दीपावली और धनतेरस के पावन अवसर पर माता लक्ष्मी के साथ उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, ताकि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वर्ग के खजांची और यक्षों के राजा कुबेर अपने पूर्व जन्म में एक चोर थे? जी हां, स्कंद पुराण में उनकी इस अद्भुत परिवर्तन की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

अपने पूर्व जन्म में कुबेर गुणनिधि नामक वेदज्ञ ब्राह्मण थे और इन्हें शास्त्रों का पूरा ज्ञान था। ये बहुत ही धर्मिक प्रवृति के थे। बुरी संगति में पड़ने के कारण उनके सारे अच्छे गुण समाप्त हो गए। जब इस बात का पता गुणनिधि के पिता को चला तो उन्होंने उसे घर से बाहर निकाल दिया। गुणनिधि शिव मंदिर में पहुंचे।
कुबेर पूर्व जन्म में इतने बड़े चोर बन गए थे की मंदिरों में भी चोरी करने से गुरेज नहीं करते थे। वह चोरी करने के लिए शिवालय में गए। उस मंदिर में बहुमूल्य खजाना था। रात में अंधेरा होने के कारण उन्हें खजाना मिल नहीं रहा था। कुबेर ने खजाना खोजने के लिए दीप जलाया लेकिन मंदिर के झरोखों से तेज हवा के आने से दीप बुझ गया। यह क्रम बहुत बार चला तो भगवान भोलेनाथ ने अपने भोलेपन के कारण इसे दीप उपासना समझ लिया और खुश होकर अगले जन्म में कुबेर को सारे संसार के धन का स्वामी बना दिया।
अगर कोई व्यक्ति रात के समय शिव जी के समक्ष दीपक लगाता हैं तो उस पर महादेव की असीम कृपा बरसती है। कुबेर जी यह बात नहीं जानते थे, अनजाने में ही सही उन्होंने रात के समय अनेक बार शिव जी के समक्ष दीपक जलाया था। जिससे भगवान भोले बाबा कुबेर जी के इस कर्म से अति प्रसन्न हो गए। प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें अगले जन्म में देवताओं का कोषाध्यक्ष नियुक्त कर दिया। तभी से कुबेर देव महादेव के परमभक्त और धनपति अर्थात धन के देवता बन गए।

पुराणों में विभिन्न कथाओं के अनुसार महर्षि पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्रवा का महर्षि भारद्वाज की पुत्री इलविला से पाणिग्रहण संस्कार हुआ था तथा उनकी कोख से कुबेर ने जन्म लिया था। ब्रह्मा जी ने इन्हें समस्त सम्पत्ति का स्वामी बनाया। इनके द्वारा उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हें उत्तर दिशा का लोकपाल बनाया तथा इनकी पुरी अलकनंदा से ही अलकनंदा नदी निकली है। इनको प्लूटो ग्रह के नाम से भी जाना जाता है। पृथ्वी में जितने भी कोष हैं, सबके अधिपति कुबेर हैं। इन्हीं की कृपा से मनुष्य को भूगर्भ स्थित निधियों की प्राप्ति होती है। प्रत्येक यज्ञान्त में इन वैश्रवण राजाधिराज को पुष्पांजलि दी जाती है।
भगवान शंकर की इन पर विशेष कृपा है। इनकी सौतेली माताओं में पुष्पोलट से रावण, कुंभकर्ण तथा मालिनी से विभीषण एवं रामा से खर-दूषण एवं शूर्पणखा उत्पन्न हुए। कुबेर की शादी मूर दानव की पुत्री से हुई जिससे इनके पुत्र नल-कुबेर तथा मणिग्रीव पैदा हुए तथा नारद जी के श्राप से गोकुल में वृक्ष बने तथा भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा उनकी मुक्ति हुई थी। इनके अनुचर यक्ष निरंतर इनकी सेवा करते हैं। यह अपने पिता को छोड़कर अपने प्रपितामह ब्रह्मा जी की सेवा में चले गए थे तथा उनकी सेवा करने से इन्हें अलकापुरी तथा लंकापुरी का स्वामी ब्रह्मा एवं शिवजी द्वारा बनाया गया था। ब्रह्मा ने इन्हें पुष्पक विमान तथा अमरत्व भी प्रदान किया था।
इनकी पुत्री का नाम मीनाक्षी था। इनकी पीठ में कूबड़ है, ये एक आंख वाले पिंगली कहलाते हैं। भगवती जगदम्बा उमा द्वारा श्राप के कारण इनकी एक आंख नष्ट हो गई थी। बाद में यह भगवती की पूजा करके निधियों के स्वामी बने। इनका अस्त्र गदा है, वाहन नर है अर्थात यह पालकी में बैठकर जाते हैं। कौटिल्य (चाण्क्य) के अनुसार कुबेर की मूर्ति खजाने में स्थापित की जानी चाहिए। वैसे तो कुबेर का निवास वट-वृक्ष कहा गया है।
