Edited By Jyoti,Updated: 26 Oct, 2019 10:27 AM
संस्कृति के रचयिता, हमारे ऋषियों-मुनियों यानि पुरातन वैज्ञानिकों ने मानव को सभ्य व्यवस्थित, अनुशासित, स्वस्थ जीवन जीने के लिए तरह-तरह से व्यवस्था की है।
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
संस्कृति के रचयिता, हमारे ऋषियों-मुनियों यानि पुरातन वैज्ञानिकों ने मानव को सभ्य व्यवस्थित, अनुशासित, स्वस्थ जीवन जीने के लिए तरह-तरह से व्यवस्था की है। जीवन के हर पहलू का बड़ी बारीकी से मौसम, जगह, रहन-सहन, खान-पान आदि का अध्ययन कर के कुछ आयाम तथा नियमों के पालन के लिए परम्पराओं एवं रिवाजों के रूप में हमारे समाज में स्थापित कर दिया। सभी परम्पराओं के पीछे वैज्ञानिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य छिपे हुए हैं। हमारी खुशियों के लिए अत्यंत आवश्यक, इन नियमों को हम अपने जीवन में अपनाएं, इसलिए इन्हें धार्मिक परम्पराओं के रूप में हमारे त्यौहारों में शामिल कर दिया।
ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि होली, बैसाखी, नवरात्रे, दशहरा, दीपावली आदि सभी त्यौहार इसी उद्देश्य को पूर्ण करते प्रतीत होते हैं।

जैसे कि सब जानते हैं कि दीपावली नजदीक आ रही है। दीपावली का ये पर्व न केवल भारत में बल्कि नेपाल, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मॉरीशस, थाईलैंड आदि भारतीय मूल से प्रभावित सभी देशों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है।
‘धार्मिक’ दृष्टि से हिन्दू वर्ग जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी की अधर्म पर विजय पाकर अयोध्या वापसी पर उनके राज तिलक के कारण इसे मनाता है, वहीं सिख समाज का बन्दी छोड़, जैन समाज का स्वामी महावीर के निर्वाण दिवस और बौद्ध धर्म का भगवान बुद्ध के कपिलवस्तु आने सहित हिंदुस्तान के लगभग सभी धर्मों के लोग इस पवित्र त्यौहार को बड़े उत्साह एवं चाव से मनाते हैं तथा पूरे समाज को साथ लेकर अपने-अपने आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना तथा कई प्रकार से धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
वहीं ‘आर्थिक’ दृष्टि से हम देखते हैं कि दीपावली के मौके पर लोग तेल के दीये, मिठाइयां, सजावटी सामान, रंगोली, फूल, मोमबत्ती, कपड़ा, सोना-चांदी, बर्तन, पटाखे आदि चीजों का जहां घरों में प्रयोग करते हैं, वहीं सगे सम्बन्धियों और मित्रों आदि को तोहफे देने के प्रचलन के कारण बड़े स्तर पर खरीदारी भी करते हैं। देश में इस खरीदारी से चलने वाले विशाल आॢथक चक्कर की वजह से सभी छोटा-बड़ा काम धंधा करने वाले करियाना, कपड़ा, बर्तन, सुनियार आदि तकरीबन हर वर्ग के व्यापारियों का आर्थिक रूप से कल्याण होता है। देश भर के पूरे वर्ष के आर्थिक रूप में दीपावली के दिनों का सबसे ज्यादा योगदान रहता है।

‘स्वास्थ्य विज्ञान’
क्या कभी हमने सोचा है कि क्यों सभी त्यौहारों में से केवल दीपावली पर ही सफाई करने, रंग-रोगन करवाने, सरसों के तेल के दीये जलाने, अलग-अलग तरह से रोशनी करने या फिर पटाखे फोड़ने का रिवाज है? इसके पीछे वैज्ञानिक आधार को समझने की ज़रूरत है। हमारा देश ऋतुओं का देश है, करीब तेरह ऋतुएं वर्ष में आती हैं। बदलता मौसम जहां हमें खुशी तथा आनन्द प्रदान करता है, वहीं बदलाव के कारण कुछ समस्याएं भी आती हैं। हिंदुस्तान के ज्यादातर प्रदेशों में अप्रैल, मई, जून में खूब गर्मी होती है, फिर जुलाई,अगस्त, सितम्बर में बरसात के मौसम में जगह-जगह जल रुकने, नमी के साथ-साथ तापमान घटने के कारण हमारे चारों ओर कुछ खतरनाक जीव पैदा होते हैं और कुछ जहरीले कीड़े-मकौड़े जमीन से बाहर आ जाते हैं। ये सूक्ष्म जीव हमारे वातावरण तथा घरों के कोने या सोफे, गमलों आदि के नीचे जहां भी ये पनप सकते हैं अपना घर बना लेते हैं जो भयानक बीमारियों का कारण बनते हैं। आप गौर करें तो पाएंगे कि ज्यादातर बीमारियां इन्हीं दिनों में होती हैं, जैसे डेंगू, चिकनगुनिया आदि।
इसीलिए उनको भगाने तथा समाप्त कर शुद्ध वातावरण बनाने के लिए दीपावली पर सफाई करने तथा रंग-रोगन करवाने का महत्व है । उसके बाद तेल के दीये या मोमबत्तियां जलाने या रोशनी करने और पटाखे फोड़ने का रिवाज है। दीपावली पर अक्सर बुजुर्ग कहते हैं कि कोई कोना दीये की रोशनी से वंचित न रहे। उनका मतलब है कि अगर हर कोने में दीया जलाया जाए तो उसकी रोशनी और गर्माहट से कीड़े खत्म हो जाएंगे। उसके बाद अगर कुछ बच गए तो जमीन पर चलने वाले पटाखे जैसे फुलझड़ियों, चकरी, अनार या अन्य छोटे बम की तेज रोशनी, गर्माहट, चिंगारियों, आवाज तथा धमाके से मर जाते हैं और हमारा वातावरण शुद्ध होता है और बीमारियां खत्म हो जाती हैं।

क्या हमने कभी सोचा कि सिख समाज दस गुरुओं के प्रकाश उत्सव मनाता है, पर हम देखते हैं कि ‘श्री गुरु नानक देव’ जी के ही प्रकाश उत्सव पर पटाखे चलाने का रिवाज क्यों है? उसका भी वही कारण है, आप देखोगे कि श्री गुरु नानक देव जी का प्रकाश उत्सव दीवाली के नजदीक आता है, तो दिवाली के बाद अगर कुछ जहरीले जीव बच जाते हैं उस दिन रोशनी और पटाखे आदि से वे भी खत्म हो जाते हैं और हमारा वातावरण शुद्ध और बीमारियों से मुक्त होता है ।
लेकिन अनजाने में दीयों और मोमबत्तियों की जगह बिजली के बल्बों ने, जमीन पर चलने वाले पटाखों की जगह आकाश में चलने वाले पटाखों और आतिशबाजियों के कारण स्वदेशी सामान की बजाय चीन के सामान ने ले ली है जिससे दीपावली के असली मकसद से भटक कर जहां हम प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं, वहीं अपने देश के मेहनतकश लोगों को काम से वंचित करते हैं। देश की बजाय विदेशों को आर्थिक लाभ होता है। मतलब दीवाली भी अपनी और दीवाला भी अपना अत: दोस्तो, हमारे पुरखे जो बहुत दूरदर्शी और विद्वान थे, उनके द्वारा चलाए गए रिवाजों के विज्ञान को समझना, जानना और अपनाना जरूरी है।