Edited By Prachi Sharma,Updated: 31 Mar, 2026 09:01 AM

Ujjain Mahakal : विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के आंगन में भीषण गर्मी के आगमन के साथ ही एक प्राचीन और अनूठी परंपरा का श्रीगणेश होने जा रहा है। वैशाख और ज्येष्ठ मास की तपिश से भगवान महाकाल को बचाने के लिए मंदिर प्रशासन और पुजारियों द्वारा...
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Ujjain Mahakal : विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के आंगन में भीषण गर्मी के आगमन के साथ ही एक प्राचीन और अनूठी परंपरा का श्रीगणेश होने जा रहा है। वैशाख और ज्येष्ठ मास की तपिश से भगवान महाकाल को बचाने के लिए मंदिर प्रशासन और पुजारियों द्वारा 'गलंतिका बंधन' की व्यवस्था की गई है।
क्या है गलंतिका बंधन परंपरा ?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण प्रतिपदा से ज्येष्ठ पूर्णिमा तक चलने वाली इस परंपरा में भगवान महाकाल के शीश पर मिट्टी की मटकियाँ बांधी जाती हैं। इन मटकियों में पवित्र नदियों के जल का आह्वान कर उन्हें भरा जाता है, जिससे निरंतर शीतल जलधारा महादेव पर प्रवाहित होती रहती है।
तिथियां: इस वर्ष यह क्रम 3 अप्रैल से प्रारंभ होकर 30 मई तक चलेगा।
समय: प्रतिदिन दोपहर 4 बजे तक यह जलधारा अनवरत बहती रहेगी।
पौराणिक संदर्भ: विष की उष्णता और शीतलता का प्रयास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले 'कालकूट' विष का पान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था। विष की भयंकर उष्णता (गर्मी) को शांत करने के लिए ही उन पर जल अर्पण करने का विशेष महत्व है। पंडितों का मानना है कि वैशाख और ज्येष्ठ के महीनों में सूर्य की तपिश बढ़ने से विष का प्रभाव भी बढ़ता है, जिसे शांत करने के लिए मिट्टी के पात्रों से ठंडे जल की धारा छोड़ी जाती है।
वैशाख मास: सेवा और पुण्य का अवसर
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 3 अप्रैल से शुरू हो रहा वैशाख मास दान-पुण्य के लिए सर्वोत्तम है। इस महीने में किए गए कुछ विशेष कार्यों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है:
जल सेवा: प्याऊ लगवाना और पशु-पक्षियों के लिए जल पात्र रखना अत्यंत फलदायी माना गया है।
पवित्र स्नान: शिप्रा नदी में स्नान के पश्चात दान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है।
मंदिरों में दान: सत्तू, चावल, जलपात्र और चंदन का दान करना इस मास की मुख्य विशेषता है।
मंदिर के पुजारियों ने बताया कि 3 अप्रैल को विधि-विधान से पूजन और आह्वान के बाद गलंतिका बांधी जाएगी, जो अगले दो महीनों तक श्रद्धालुओं के आकर्षण और आस्था का केंद्र रहेगी।