विदुर जी से जानिए कैसा भोजन ग्रहण करना होता है अनीति के समान

Edited By Updated: 15 Sep, 2020 11:59 AM

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विदुर जी यह जानते थे कि नीति की जगह अनीति पर चलने के कारण ही धृतराष्ट्र तथा दुर्योधन आदि कौरवों के पतन का मार्ग प्रशस्त होता जा रहा है।

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विदुर जी यह जानते थे कि नीति की जगह अनीति पर चलने के कारण ही धृतराष्ट्र तथा दुर्योधन आदि कौरवों के पतन का मार्ग प्रशस्त होता जा रहा है। विदुर जी ने अनीति से कमाए अन्न के दुष्प्रभाव से बचने के लिए गंगा किनारे कुटिया बनाकर अपनी पत्नी सुलभा के साथ रहना शुरू कर दिया था। वे शाक-भाजी तथा फल ग्रहण करते, अपना समय भगवद्भजन तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन में लगाकर उसका सदुपयोग करते। समय-समय पर कौरवों को अनीति के दुष्परिणामों की चेतावनी भी देते रहते थे।
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भगवान श्री कृष्ण संधि दूत बनकर धृतराष्ट्र आदि के पास गए। कौरवों ने उनके सद्परामर्श को मानने से इंकार कर दिया। उनके आग्रह के बाद श्री कृष्ण ने कौरवों का राजसी भोजन करने से इंकार कर दिया। वे वहां से विदुर जी की कुटिया में पहुंचे। विदुर जी से बोले, ‘‘मुझे भूख लगी है भोजन कराइए।’’ सुलभा जी ने बधुए का शाक उनके समक्ष परोस दिया। वे बड़े स्नेह से शाक-भाजी ग्रहण करने लगे। 

विदुर जी ने हंस कर कहा, ‘‘भइया क्या कौरवों ने भोजन के लिए नहीं कहा।’’ 
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श्री कृष्ण बोले, ‘‘विदुर जी मैं अनीति पर चलने वालों का अन्न कैसे ग्रहण कर सकता था। मुझे जो दिव्य स्वाद और संतोष आप जैसे परम सात्विक, नीतिमान और भक्त ह्रदय दम्पति के घर इस सात्विक भोजन में मिल रहा है वह अन्याय, अनीति और अहंकार में अंधे हुए धृतराष्ट्र के महल में राजसी भोजन करने से कैसे मिल सकता था।’’    
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—शिव कुमार गोयल 
 

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