बंटवारा 1947 रिव्यू: दमदार अभिनय और भावुक कहानी के साथ असर छोड़ती है फिल्म

Edited By Updated: 14 Aug, 2026 12:40 PM

bantwara 1947 movie review in hindi

यहां पढ़ें कैसी है सन्नी देओल की फिल्म बंटवारा

फिल्म: बंटवारा 1947(Bantwara 1947)
कलाकार: सनी देओल (Sunny Deol),शबाना आजमी (Shabana Azmi), प्रीति जिंटा (Preity Zinta), करण देओल (Karan Deol) और अली फजल (Ali Fazal),अभिमन्यु सिंह (Abhimanyu Singh)
निर्देशन: राजकुमार संतोषी 
रेटिंग: 3.5*

Bantwara 1947: ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों का निर्देशन कर चुके राजकुमार संतोषी एक बार फिर सनी देओल के साथ दमदार कहानी बंटवारा 1947 के साथ हाजिर हैं। फिल्म में शबाना आजमी, प्रीति जिंटा, करण देओल और अली फजल अहम भूमिकाओं में हैं, जबकि अभिमन्यु सिंह विलेन के किरदार में नजर आ रहे हैं। आइए जानते है कैसी है फिल्म बंटवारा 1947।

कहानी
फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 1947 के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित है। जहां बंटवारे के बाद हुए हिंदू मुस्लिम दंगों में सिकन्दर मिर्जा जिनकी भूमिका सनी देओल निभा रहे हैं। उन्हें अपने परिवार के साथ हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान आना पड़ता है। लाहौर आने के बाद उन्हें जो हवेली रहने के लिए मिलती है वह दुर्गावती यानि शबाना आजमी की होती है जो उस हवेली और अपने घर को नहीं छोड़ना चाहती हैं। इसी के बाद शुरू होती है हिंदू मुस्लिम के बीच की जंग जो आपको फिल्म में देखने को मिलेगी।

अभिनय
सनी देओल एक बार फिर अपने दमदार अंदाज में नजर आते हैं। उनके अभिनय में गुस्सा, दर्द और भावनाओं का अच्छा संतुलन देखने को मिलता है। 

प्रीति जिंटा करीब 8 साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं और उनकी वापसी में वही पुराना चार्म बरकरार नजर आता है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और एक्टिंग सहज है, जो किरदार में एक अलग ही गर्माहट और भावनात्मक गहराई जोड़ती है।

शबाना आजमी अपने अनुभव के साथ किरदार में गहराई लाती हैं और उनके सीन प्रभावी लगते हैं। करण देओल ने भी अपने किरदार को अच्छी तरह निभाया है, जबकि अली फजल का अभिनय कहानी को मजबूती देता है। वहीं, अभिमन्यु सिंह विलेन के रूप में खास प्रभाव छोड़ते हैं। उनके हाव-भाव और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस किरदार को खतरनाक और यादगार बनाते हैं।

निर्देशन
निर्देशक राजकुमार संतोषी ने फिल्म को बेहद संतुलित तरीके से पेश किया है। 1947 के बंटवारे की त्रासदी, उस दौर का दर्द और लोगों के संघर्ष को पर्दे पर प्रभावी ढंग से दिखाया गया है। स्क्रीनप्ले काफी मजबूत है और कहानी कहीं भी बेवजह खिंची हुई महसूस नहीं होती। फिल्म की रफ्तार बनी रहती है, जिससे दर्शक कहानी से जुड़े रहते हैं।
डायलॉग्स कहानी के भावनात्मक असर को और मजबूत करते हैं। कई संवाद सीधे दिल तक पहुंचते हैं।

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