Edited By Tanuja,Updated: 17 Feb, 2026 01:25 PM

बांग्लादेश में जनमत-संग्रह और संविधान सुधार परिषद को लेकर राजनीतिक टकराव गहरा गया है। BNP द्वारा दूसरी शपथ से इनकार के बाद जमात-ए-इस्लामी ने भी सांसद के रूप में शपथ लेने से मना कर दिया, जिससे संसद का गठन अधर में लटक गया है।
International Desk: बांग्लादेश में 13वीं संसद के गठन से पहले ही जनमत-संग्रह और संविधान सुधार परिषद को लेकर बड़ा राजनीतिक गतिरोध सामने आ गया है। चुनाव में विजयी Bangladesh Nationalist Party (BNP) द्वारा संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ लेने से इनकार किए जाने के बाद दक्षिणपंथी Jamaat-e-Islami ने भी अपने नवनिर्वाचित सांसदों की शपथ रोक दी। मंगलवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त AMM Nasir Uddin ने संसद भवन Jatiya Sangsad में BNP सांसदों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसके बाद जमात-ए-इस्लामी के सांसदों की शपथ होनी थी, लेकिन BNP के फैसले के चलते स्थिति जटिल हो गई।
जमात-ए-इस्लामी के उपाध्यक्ष Abdullah Mohammad Taher ने स्पष्ट कहा कि जब तक BNP सांसद नियमित सांसदों के साथ-साथ संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में भी शपथ नहीं लेते, तब तक उनकी पार्टी संसद सदस्य के रूप में शपथ नहीं लेगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के अनुसार, “संवैधानिक सुधारों के बिना संसद का कोई अर्थ नहीं है।”संविधान सुधार परिषद की दूसरी शपथ तथाकथित ‘जुलाई चार्टर’ को लागू करने की प्रतिबद्धता से जुड़ी है, जिसमें संविधान में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव है। जनमत-संग्रह में 84 सूत्रीय जटिल प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें निर्वाचन आयोग के अनुसार 60 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने ‘हां’ में मतदान किया।
वहीं BNP की नीति-निर्धारण स्थायी समिति के सदस्य और नवनिर्वाचित सांसद Salahuddin Ahmed ने शपथ ग्रहण से पहले पार्टी सांसदों से कहा कि उन्हें संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में नहीं चुना गया है और अभी तक इस परिषद से जुड़ा कोई भी प्रावधान संविधान का हिस्सा नहीं है। पार्टी अध्यक्ष Tarique Rahman की मौजूदगी में उन्होंने दो टूक कहा, “हममें से कोई भी दूसरी शपथ नहीं लेगा।” गौरतलब है कि अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina की पार्टी अवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने के बाद हुए 13वें संसदीय चुनाव में BNP ने 297 में से 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। मौजूदा टकराव से साफ है कि बांग्लादेश की नई संसद की शुरुआत ही संवैधानिक विवादों के साये में हो रही है।