मादुरो का पतन या, तेल की राजनीति : निकोलास मादुरो की गिरफ़्तारी का भारत के लिए क्या मतलब है – प्रोफ. ध्रुव कुमार

Edited By Updated: 19 Jan, 2026 06:05 PM

dhruva kumar scotland glassgow

प्रोफेसर ध्रुव कुमार, स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित राजनेता, पूर्व सांसद प्रत्याशी, विख्यात शिक्षाविद और प्रमुख भू‑राजनीतिक अर्थशास्त्री का कहना है की जब अमेरिकी सेनाओं ने वेनेज़ुएला की तरफ़ कदम बढ़ाए और निकोलास मादुरो को पकड़कर अमेरिकी हिरासत में ले जाया...

International Desk: प्रोफेसर ध्रुव कुमार, स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित राजनेता, पूर्व सांसद प्रत्याशी, विख्यात शिक्षाविद और प्रमुख भू‑राजनीतिक अर्थशास्त्री का कहना है की जब अमेरिकी सेनाओं ने वेनेज़ुएला की तरफ़ कदम बढ़ाए और निकोलास मादुरो को पकड़कर अमेरिकी हिरासत में ले जाया गया, तो वॉशिंगटन ने इसे एक ‘धोखेबाज़ तानाशाह’ को हटाने की देर से सही, न्यायपूर्ण कार्रवाई के रूप में पेश किया।

लेकिन भारत के लिए कराकस से आई ये तस्वीरें कुछ और कहती हैं। ट्रंप के दौर में अमेरिका केवल नक्शा ही नहीं बदलना चाहता, बल्कि एक ही झटके में तेल के रास्ते भी अपने हिसाब से मोड़ने की ताकत दिखा रहा है। यह सिर्फ लैटिन अमेरिका की कहानी नहीं है, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति की परीक्षा है – जब एक महाशक्ति यह तय करने लगे कि किसी दूसरे देश के तेल पर कौन बैठेगा।

हथियारबंद प्रतिबंधों की दुनिया में रणनीतिक स्वायत्तता
स्कॉटिश राजनीतिज्ञ ध्रुव कुमार आगे लिखते हैं कि आज़ादी के बाद से भारत की विदेश नीति एक बुनियादी सिद्धांत पर खड़ी रही है – किसी का मोहरा नहीं बनना। शीत युद्ध हो, अमेरिका की एकध्रुवीय ताकत हो या अब टूटती‑बनती बहुध्रुवीय दुनिया, इस प्रवृत्ति ने हर दौर में भारत को संतुलन दिया है।

चम्पारण की पावन धरती पर जन्मे, स्कॉटिश राजनीतिज्ञ ध्रुव कुमार, मादुरो की गिरफ्तारी इस सिद्धांत को सीधे चुनौती देती है, क्योंकि यहाँ तीनों औज़ार – सैन्य शक्ति, आर्थिक प्रतिबंध और संसाधनों पर नियंत्रण – को एक साथ जोड़कर दबाव बनाया गया है। भारत न तो किसी ऐसे नेता के साथ खड़ा दिखना चाहता है जिस पर चुनावी धांधली और दमन के आरोप हों, और न ही वह ऐसा उदाहरण स्वीकार कर सकता है, जहाँ किसी देश की सरकार बदलने, उसके राष्ट्रपति को हिरासत में लेने और उसके तेल क्षेत्र पर नियंत्रण का अधिकार एकतरफ़ा सैन्य बल के दम पर जताया जाए।

ऊर्जा सुरक्षा: मौका भी, दबाव भी
ध्रुव कुमार का मानना है की, ऊपरी तौर पर देखें तो भारत आज वेनेज़ुएला की उथल‑पुथल से पहले के मुकाबले कम सीधा प्रभावित दिखता है। एक समय रिलायंस और नयारा जैसे रिफ़ाइनर वेनेज़ुएला के भारी कच्चे तेल के बड़े खरीदार हुआ करते थे, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों, कंप्लायंस रिस्क और सस्ते रूसी तेल की उपलब्धता ने इन ख़रीदारियों को बेहद कम कर दिया। जो देश कभी भारत के लिए महत्वपूर्ण सप्लायर था, वह अब कच्चे तेल की टोकरी में लगभग हाशिये पर चला गया है।

फिर भी ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ़ आज की मात्रा नहीं, बल्कि कल के विकल्पों का खेल है। वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडारों में से कुछ हैं। लंबे समय तक यह भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए भारी क्रूड का भरोसेमंद स्रोत रहा है और यहाँ भारतीय कंपनियों ने अपस्ट्रीम निवेश भी किए हैं। यदि कराकस में अमेरिकी निगरानी में ‘पुनर्गठन’ सफल होता है, तो भारत के लिए कई दरवाज़े दोबारा खुल सकते हैं – बकाया वसूली, पुराने प्रोजेक्ट्स का पुनर्जीवन और लंबी अवधि के सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट।

चुनौती यह है कि इन दरवाज़ों की चाबी किसके हाथ में होगी। अगर वॉशिंगटन वेनेज़ुएला के तेल को एक ‘कंट्रोल्ड एसेट’ की तरह देखता है, जहाँ पहले अमेरिकी और करीबी सहयोगी रिफ़ाइनरों को प्राथमिकता मिले, और भारतीय भागीदारी को व्यापक राजनीतिक रियायतों – जैसे टैरिफ, रूस नीति या चीन पर रुख – से जोड़ दिया जाए, तो जो चीज़ मौका दिख रही है, वही दबाव के औज़ार में बदल सकती है।

महाशक्तियों की रस्साकशी: भारत के लिए जोखिम और लाल रेखाएँ
ध्रुव कुमार का कहना है की वेनेज़ुएला अब अमेरिका, चीन और रूस के बीच एक बड़े टकराव का मंच बन चुका है। मादुरो ने क़र्ज़, हथियार और कूटनीतिक सहारे के लिए सालों तक मॉस्को और बीजिंग पर भरोसा किया। उनकी गिरफ़्तारी न केवल उनके ‘पश्चिमी गोलार्ध’ में प्रभाव को कमजोर करती है, बल्कि दुनिया को यह भी याद दिलाती है कि अमेरिकी हार्ड पावर अभी भी पूरी तरह रिटायर नहीं हुई, बस चुनिंदा जगहों पर इस्तेमाल हो रही है।

भारत के लिए यहाँ तीन ख़तरे साफ़ दिखते हैं:

रेजीम‑चेंज की राजनीति को सामान्य बनाना: अगर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इस विचार से सहमत हो जाती है कि किसी नेता को ‘अवैध’ करार देकर बिना मज़बूत बहुपक्षीय प्रक्रिया के हटाया जा सकता है, तो यह भविष्य में दूसरे देशों में भी ऐसे प्रयोगों की हदें कम कर देता है। भारत वेनेज़ुएला नहीं है, लेकिन जो देश रूस, ईरान और चीन पर स्वतंत्र लाइन रखता है, वह कभी आराम से नहीं बैठ सकता, जब ‘राजनीतिक प्रणाली’ को बल प्रयोग का बहाना बना दिया जाए।

अतिरिक्त क्षेत्रीय लागू‑कानून (एक्स्ट्रा‑टेरिटोरियल एनफोर्समेंट): वेनेज़ुएला फाइल ने दिखाया है कि प्रतिबंधों का असर शिपिंग, बीमा, ट्रेडिंग और फ़ाइनेंस तक कैसे फैलाया जा सकता है। यह वही टूलकिट है जो किसी भी देश पर लागू हो सकता है, अगर उसकी आर्थिक नीतियाँ वॉशिंगटन को पसंद न आएँ। भारत पहले ही रूसी तेल पर टैरिफ और दबाव के ज़रिए इसका स्वाद चख चुका है; आगे टेक्नोलॉजी, पेमेंट सिस्टम और डिफ़ेंस सोर्सिंग पर भी ऐसे औज़ार इस्तेमाल हो सकते हैं।

जटिल विकल्पों को ‘या तो–या’ की फ्रेमिंग में क़ैद करना: अमेरिका मादुरो की विदाई को लोकतंत्र बनाम तानाशाही की लड़ाई बताएगा; चीन और रूस इसे साम्राज्यवाद कहेंगे। भारत – जो एक लोकतंत्र है लेकिन संप्रभुता और गैर‑हस्तक्षेप का भी उतना ही मज़बूत पक्षधर है – इन दोनों खाँचों में पूरी तरह फिट नहीं बैठता। अगर भारत को इस कच्चे बाइनरी में धकेला गया, तो उसकी कूटनीतिक जगह बढ़ने की बजाय सिकुड़ जाएगी।

ट्रंप का अमेरिका: भारत के लिए अवसर या ख़तरा?
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल इन सभी तनावों को और तेज़ करता है। भारत के लिए उनका रिकॉर्ड पहले से ही मिला‑जुला रहा है – साझेदारी पर उदार भाषा, लेकिन भारतीय निर्यात पर भारी टैरिफ और रूसी तेल पर खुला दबाव। मादुरो की गिरफ़्तारी इस पैटर्न को अर्थव्यवस्था और ट्विटर से आगे बढ़ाकर अब सैन्य कार्रवाई तक ले जाती है।

कुछ तरह से ट्रंप‑नेतृत्व वाला अमेरिका भारत के लिए फायदेमंद भी हो सकता है: चीन के प्रति उनकी कड़ाई भारत की Indo‑Pacific रणनीति में अहमियत बढ़ाती है कराकस में रूस और चीन से नज़दीक एक शासन के कमजोर होने से भारत के व्यापक भू‑आर्थिक वातावरण में हल्की राहत मिलती है।

लेकिन साथ‑साथ तीन साफ़ नुक़सान भी हैं:

- भारतीय निर्यात पर लगातार टैरिफ और नए व्यापार अवरोधों की धमकी, भारत की निर्यात‑आधारित वृद्धि को कमजोर करती है और वॉशिंगटन की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।
- पाकिस्तान की ओर अमेरिकी ‘री‑एंगेजमेंट’ – चाहे वह हथियार सौदों के रूप में हो या खाड़ी व मध्य एशिया में रणनीतिक उपयोगिता के तौर पर – रावलपिंडी को मुनासिब संदेश नहीं, बल्कि बढ़ावा दे सकता है और भारत की सुरक्षा स्थितियों को पेचीदा बना सकता है।
- ऐसी विदेश नीति जो खुले तौर पर दबाव और ज़बरदस्ती पर टिकी हो, वह भारत की संप्रभुता की भावना और उसकी यह इच्छा कि वह रूस, ईरान और चीन पर कोई बाहरी डिक्टेशन न ले, उससे साफ़ टकराव में आती है।

भारत को अब क्या करना चाहिए?
ध्रुव कुमार के अनुसार भारतीय नीति निर्माताओं के लिए मादुरो प्रकरण एक सख्त याद दिलाने जैसा है कि दुनिया के मंच पर फिर से खालिस ताकत लौट आई है। सही प्रतिक्रिया ग़ुस्सा नहीं, बल्कि अनुशासन और दूरदृष्टि है। तीन प्राथमिकताएँ साफ़ दिखती हैं:

- भारत को लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का समर्थन जारी रखना चाहिए, लेकिन साथ‑साथ, निजी तौर पर और बहुपक्षीय मंचों पर साफ़ संकेत देना चाहिए कि वह किसी भी ऐसी सोच का समर्थन नहीं करता, जो संप्रभु देशों पर लंबे समय तक बाहरी कंट्रोल को सामान्य बना दे।

- वेनेज़ुएला में कोई भी नया अवसर भारत के लिए बकाया राशि वसूलने और व्यावसायिक शर्तों पर तेल सुनिश्चित करने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए – लेकिन इस शर्त पर नहीं कि भारत अपनी नीति स्वायत्तता कहीं और गिरवी रख दे। रूस, खाड़ी, अफ्रीका और घरेलू उत्पादन – सब को मज़बूत करना होगा, ताकि कोई एक रूट भारत की ऊर्जा सुरक्षा की ‘गला‑घोंटू नली’ न बन सके।

- व्यापार, तकनीक और सुरक्षा के मोर्चे पर भारत को खुद को एक अप्रतिस्थाप्य भागीदार के रूप में पेश करना होगा, जिसका सहयोग किसी भी अल्पकालिक तेल‑आधारित सज़ा से ज़्यादा मूल्यवान है। इसका मतलब है – बातचीत में सख़्ती, प्रतिबद्धताओं में स्थिरता और यह बिना झिझक के स्पष्ट करना कि भारत किसी का जूनियर पार्टनर नहीं बनेगा – न कराकस में, न कीव में, न ही दक्षिण चीन सागर में।

- शिक्षाविद ध्रुव का मानना है की मादुरो की गिरफ़्तारी भले भूगोल के लिहाज से लैटिन अमेरिका तक सीमित दिखे, लेकिन इसके सबक़ वैश्विक हैं। ऐसे दौर में, जब प्रतिबंध मिसाइलों के साथ आते हैं, भारत की सबसे बड़ी बीमा यही रहेगी जो हमेशा रही है – विकल्पों का विविधीकरण, मज़बूत तंत्रिकाएँ और ऐसी विदेश नीति जो किसी और राजधानी नहीं, बल्कि दिल्ली में लिखी जाए।

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